ऋषभदेव के सब पुत्र सब, भरत आदि शत एक |
दीक्षा ले शिवपद लिया, नमूं नमूं शिर टेक ||
ॐ ह्रीं श्रीऋषभदेवस्य मोक्षप्राप्त श्रीभरतादि शतैकपुत्र सिद्धपरमेष्ठीभ्यो नम: ||
ऋषभदेव के सब पुत्र सब, भरत आदि शत एक |
दीक्षा ले शिवपद लिया, नमूं नमूं शिर टेक ||
ॐ ह्रीं श्रीऋषभदेवस्य मोक्षप्राप्त श्रीभरतादि शतैकपुत्र सिद्धपरमेष्ठीभ्यो नम: ||
जल चन्दन आदि मिलाय, अर्घ बनाय लिया |
निज पद अनर्घ के हेतु, आप चढ़ाय दिया ||
जिन समवशरण की भूमि, अतिशय विभव धरे |
जो पूजे जिनपद, वे निज विभव करें ||
ॐ ह्रीं अर्हं समवशरण विभूतिमंडिताय श्रीऋषभदेव तीर्थंकराय नम: ||
वारि गंध अक्षत कुसुमदिक, उसमें बहुरत्नादि मिले |
अर्घ चढ़ाकर तुम गुण गाऊँ, सम्यक ज्ञान प्रसून मिले ||
श्री वृषभेश भरत बाहुबली, तीनों के पद कमल जजूं |
निज के तीन रत्न को पाकर, भव-भव दुःखसे शीघ्र भून ||
ॐ ह्रीं तीर्थंकर वृषभदेवतत्सुत भरत बाहुबली चरणेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||
आतम धर्म का प्रेरक ध्वज, यह सत्यम शिव सुंदर है महान |
परमेष्ठी अणुव्रत महाव्रत के, करते पांचों वरवान ||
पहला रंग है ‘लाल’ सत्य का, करता जग में उजियाला ;
सात तत्व की स्थिरता का, बोध कराता है आला ;
जीयो और जीने दो सबको, अरहंत का उपदेश महान ||1||
“पीलवर्ण” केशर सा सुंदर, है अचौर्य व्रत की पहचान ;
निर्भय होकर रहें सभी जन, शांति सुधा का करके पान ;
उपाध्याय जो स्वयं शांतिमय, वीतराग का करें वरवान ||2||
“श्वेत रंग” अहिंसा का दर्शक, स्वस्ति चिन्ह गति चार निशान,
शुद्ध स्वरूपी सिद्ध प्रभु का, देता है हम को यह ज्ञान;
अर्धचन्द्र शिवथल दर्शाता, रत्नत्रय त्रिय बिंदु मान ||3||
ब्रह्मचर्य का “हरित वर्ण” शुभ, हैं आचारज गुरु प्रधान,
हरे भरे भरपूर रहें नित, जो अनंत है वीरजवान,
दुखियों को सर सव्ज बनाना, हम सबको बतलाता ज्ञान ||4||
“नील वर्ण” अपरिग्रह द्योतक, ज्ञान ध्यान का हो चिंतन,
सर्वसाधू का जो है प्रतीक, करता ‘वसंत’ ध्वज वन्दन,
हिल मिल हम साथ चलें, ह्जाये ना पावे इसकी शान ||5||