तीर्थंकर ऋषभदेव समवशरण का अर्घ्य

 जल चन्दन आदि मिलाय, अर्घ बनाय लिया |

निज पद अनर्घ के हेतु, आप चढ़ाय दिया ||

जिन समवशरण की भूमि, अतिशय विभव धरे |

जो पूजे जिनपद, वे निज विभव करें ||


 ॐ ह्रीं अर्हं समवशरण विभूतिमंडिताय श्रीऋषभदेव तीर्थंकराय नम: ||


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