जिनवाणी के ऑनलाइन संकलन का एक प्रयास
जल चन्दन आदि मिलाय, अर्घ बनाय लिया |
निज पद अनर्घ के हेतु, आप चढ़ाय दिया ||
जिन समवशरण की भूमि, अतिशय विभव धरे |
जो पूजे जिनपद, वे निज विभव करें ||
ॐ ह्रीं अर्हं समवशरण विभूतिमंडिताय श्रीऋषभदेव तीर्थंकराय नम: ||