वारि गंध अक्षत कुसुमदिक, उसमें बहुरत्नादि मिले |
अर्घ चढ़ाकर तुम गुण गाऊँ, सम्यक ज्ञान प्रसून मिले ||
श्री वृषभेश भरत बाहुबली, तीनों के पद कमल जजूं |
निज के तीन रत्न को पाकर, भव-भव दुःखसे शीघ्र भून ||
ॐ ह्रीं तीर्थंकर वृषभदेवतत्सुत भरत बाहुबली चरणेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||