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जिनवाणी माता का अर्घ्य

 अरिहंत देव की दिव्य ध्वनि से, जो भी निकली है वाणी |

स्वाद्वाद अनेकांत मयी, वह कहलाती है जिनवाणी ||

नय निक्षेप तत्व पदार्थ का, इसमें पूर्ण विवेचन है |

भव तरने की बात इसी में, संशय इसमें लेष न है ||


ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||


जिनवाणी माता की आरती

आज करें हम जिनवाणी की, आरती मंगलकारी |
दीप जलाकर ग्रिट के लाए, हे माँ तेरे द्वार ||
हो माता हम सब उतारे तेरी आरती...
तीर्थंकर की दिव्य देशना, ओमकारमय प्यारी |
सुख शांति सौभाग्य प्रदायक, जन-जन की मनहारी ||1||
हो माता हम सब उतारे तेरी आरती...
मिथ्या मोह नशाने वाली, है जिनवाणी माता |
ध्याने वाले जग जीवों को, देने वाली साता ||2||
हो माता हम सब उतारे तेरी आरती...
गणधर द्वारा झेली जाती, तीर्थंकर की वाणी |
मोक्षमार्ग दिखलाने वाली, सर्व जगत कल्याणी ||3||
हो माता हम सब उतारे तेरी आरती...
जो जिनवाणी को ध्याते, वे सुख शांति पाते |
पूजा अर्चना करने वाले, केवल ज्ञान जगाते ||4||
हो माता हम सब उतारे तेरी आरती...
महिमा सुनकर हे माता, द्वार आपके आये |
विशद भाव से आरती करके, सादर शीश झुकाये ||5||
हो माता हम सब उतारे तेरी आरती...
सुख शांति सौभाग्य बढाकर, मुक्ति राह दिखाओ |
देकर के आशीष हे माता, शिवपुर में पहुँचाओ ||6||
हो माता हम सब उतारे तेरी आरती...

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