अरिहंत देव की दिव्य ध्वनि से, जो भी निकली है वाणी |
स्वाद्वाद अनेकांत मयी, वह कहलाती है जिनवाणी ||
नय निक्षेप तत्व पदार्थ का, इसमें पूर्ण विवेचन है |
भव तरने की बात इसी में, संशय इसमें लेष न है ||
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||