श्री पार्श्वनाथ भगवान की आरती

प्रभु पारस की भवतारक की, ले मंगल दीप प्रजाल हो |
आज उतारूं आरतिया, मैं आज उतारूं आरतिया ||
तीन छत्र प्रभु के सर सोहे, चौसठ चमर ढूरे हैं |
सिंह पीठ पर अन्तरिक्ष, पद्मासन ध्यान धरे हैं ||
जगदीश्वर की, नागेश्वर की, शुभ मंगल भावना धाएँ |
आज उतारूं आरतिया, मैं आज उतारूं आरतिया ||
बार-बार नयनों से देखी, मूरत आज अनोखी |
मोक्षनगर जाने को यह, राह बताबत चोखी ||
फणी मंडित की प्रतिबिम्बित की, मनहर शुभ देपे प्रजाल हो |
आज उतारूं आरतिया, मैं आज उतारूं आरतिया ||
तेज पुंजमय वर्ण कान्ति लखि, रवि शशि मंद भये हैं |
नत मस्तक हो पद पंकजतर, सुंदर सुमन धरे हैं ||
तन पुलकित कर, मन हर्षित कर, रतनन कि दीप अपार हो |
खूब उतारूं आरतिया, मैं आज उतारूं आरतिया ||
चिंतामणि पारस कल्पतरु की, मिलकर सब जय बोलो |
नृत्यगान से भक्ति बढाकर, आज हृदय पट खोलो ||
सब मिलकर के गुण गाकर के, हाथों में दीप अपार हो |
आज उतारूं आरतिया, मैं आज उतारूं आरतिया ||

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