जिनवाणी के ऑनलाइन संकलन का एक प्रयास
दशलक्षण का अर्घ्य
आठों दरब संवार, द्यानत अधिक उछाह सों |
भव-आताप निवार, दस लच्छन पूजों सदा ||
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||
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