पंच बालयति का अर्घ्य

सजि वसुविधि द्रव्य मनोज्ञ अरघ बनावत हैं |
वसुकर्म अनादि संयोग, ताहि नशावत हैं ||
श्री वासुपूज्य-मलि-नेम, पारस वीर अति |
नमूं मन-वच-तन धरि प्रेम, पाँचों बालयती ||

ॐ ह्रीं श्री पंचबालयति तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||

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