जल फल आठों दरब चढाय, द्यानत वरत करो मन लाय |
परमगुरु हो, जय-जय नाथ परमगुरु हो ||
दरश-विशुद्धि भावना भाय, सोलह तीर्थंकर पद दाय |
परमगुरु हो, जय-जय नाथ परमगुरु हो ||
ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||