जल फलादि वसु द्रव्य मिलाकर, अर्घ्य चढ़ाऊँ मैं स्वामी |
दर्शन ज्ञान चरित गुण आदि, निज में प्रगट करूं स्वामी ||
देव शास्त्र गुरु विद्यमान श्री, बीस तीर्थंकर नमन करूं |
सिद्धप्रभु का ध्यान धरूं, अनर्घ्य पर को प्राप्त करूं ||
ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्रगुरुभ्यो विद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यो अनंतानंतसिद्धपरमेष्ठीभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||