श्री निर्वाणक्षेत्र का अर्घ्य

जल गन्ध अक्षत फूल चरु, फल दीप धूपायन धरों |
दयानत करो निरभय जगतसों, जोरकर विनती करों ||
सम्मेदगढ़ गिरनार चम्पा, पावपुर कैलाश कौं |
पूजों सदा चौबीस जिन, निर्वाणभूमि निवास कौं ||

ॐ ह्रीं श्रीचतुर्विंशति तीर्थंकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||

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