जल चन्दन अक्षत फूल चरु, अरु दीप धूप अति फल लावे |
पूजा को ठानत जो तुम जानत, सो नर द्यानत सुख पावै ||
तीर्थंकर को ध्वनि, गणधर ने सुनी, अंग रचे चुनि ज्ञान मई |
सो जिनवर वानी, शिवसुखदानी, त्रिभुवन मानी पूज्य भई ||
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||