जल फलादि वसु दरब सजाके, हेम पात्र बहर लाऊँ |
मन वच काय नमूं तुम चरना, बार-बार सर नाऊँ ||
राम हनू सुग्रीव आदि जे, तुंगीगिरि थिर थाई |
कोड़ी निन्यानवे मुक्ति गये मुनि, पूजूं मन वच काई ||
ॐ ह्रीं श्री तुंगीगिरि सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||