जल चंदन अक्षत लेय, सुमन महाप्यारी |
चरु दीप धूप फल सोय, अरघ करों भारी ||
द्वय चक्री दस काम कुमार, भव तर मोक्ष गये |
तातें पूजौं पद-सार, मन में हरष ठये ||
ॐ ह्रीं श्री सिद्धवरकूट सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||