(दोहा)
परम ज्योति परमात्मा, परम ज्ञान परवीन |
वंदूं परमानंदमय, घट-घट अंतर लीन ||1||
(चौपाई)
निर्भयकरन परम परधान, भव समुद्र जल तारन यान |
शिव मन्दिर अघ हरन अनिंद, वंदूं पार्श्व चरण अरविंद ||2||
कमठ मान भंजन वर वीर, गरिमा सागर गुण गंभीर |
सुर गुरु पार लहें नहिं जास, मैं अजान जापूँ जस तास ||3||
प्रभु स्वरूप अति अगम अथाह, क्यों हम सेती होय निवाह |
ज्यों दिन अंध उल्लू को होत, कहि न सके रवि किरण उद्योत ||4||
मोह हीन जाने मनमाहीं, तो न तुम गुन वरने जाहिं |
प्रलय पयोधि करे जल गौन, प्रगटहिं रतन तिहिं गिने कौन ||5||
तुम असंख्य निर्मल गुणखान, मैं मतिहीन कहूँ निज बान |
ज्यों बालक निज बाँह पसार, सागर परमित कहे विचार ||6||
जे जोगीन्द्र करहिं तप खेद, तेऊ न जानहिं तुम गुनभेद |
भक्तिभाव मुझ मन अभिलाष, ज्यों पंछी बोले निज भाष ||7||
तुम जस महिमा अगम अपार, नाम एक त्रिभुवन आधार |
आवे पवन पदमसर होय, ग्रीषम तपन निवारे सोय ||8||
तुम आवत भवि जन माहीं, कर्मनि बंध शिथिल ह्वे जाहिं |
ज्यों चन्दन तरु बोलहिं मोर, डरहिं भुजंग भगें चहु ओर ||9||
तुम निखरत जन दीनदयाल, संकट तें छूटें तत्काल |
ज्यों पशु घेर लेहिं निशि चोर, ते तज भागहिं देखत भोर ||10||
तुम भविजन तारक इमि होहि, जे चित धारें तिरहीं ले तोहि |
यह ऐसे करि जान स्वभाव, तिरहिं मसक ज्यों गर्भित बाव ||11||
जिहँ सब देव किये वश वाम, तैं छिन में जीत्यो सो काम |
ज्यों जल करे अगनि कुल हान, बडवानल पीवे सो पान ||12||
तुम अनंत गुरुव गुन लिए, क्यों कर भक्ति धरूं निज हिये |
ह्वे लघुरूप तिरहिं संसार, प्रभु तुम महिमा अगम अपार ||13||
क्रोध निवार कियो मन शांत, कर्म सुभट जीते किहिं भांत |
यह पटुतर देखहु संसार, नील वृक्ष ज्यों दहै तुषार ||14||
मुनिजन हिये कमल निज टोहि, सिद्धरूप सम ध्यावहिं तोहि |
कमल-कर्णिका बिन-नहिं और, कमल बीज उपजन की ठौर ||15||
जब तुव ध्यान धरे मुनि कोय, तब विदेह परमातम होय |
जैसे धातु शिला तनु त्याग, कनक स्वरूप धवे जब आग ||16||
जाके मन तुम करहु निवास, विनशि जाय सब विग्रह तास |
ज्यों महंत ढिंग आवे कोय, विग्रहमूल निवारे सोय ||17||
करहिं विबुध जे आत्मध्यान, तुम प्रभाव तें होय निदान |
जैसे नीर सुधा अनुमान, पीवत विष विकार की हान ||18||
तुम भगवंत विमल गुणलीन, समल रूप मानहिं मतिहीन |
ज्यों पीलिया रोग दृग गहे, वर्ण विवर्ण शंख सों कहें ||19||
(दोहा)
निकर रहत उपदेश सुन, तरुवर भयो अशोक |
ज्यों रवि ऊगत सब जीव, प्रगट हॉट भुविलोक ||20||
सुमन वृष्टि ज्यों सुर करहिं, हेठ बीठमुख सोहिं |
त्यों तुम सेवत सुमन जन, बंध अधोमुख होहिं ||21||
उपजी तुम हिय उदधि तें, वाणी सुधा समान |
जिहं पीवत भविजन लहहिं, अजर अमर पदस्थान ||22||
कहहिं सार तिहुं लोक को, ये सुर चामर दोय |
भाव सहित जो जिन नमहिं, तिहँ गति ऊरध होय ||23||
सिंहासन गिरि मेरु सम, प्रभु धुनि गरजत घोर |
श्याम सुतनु घनरूप लखि, नाचत भविजन मोर ||24||
छवि हत होत अशोक दल, तुम भामंडल देख |
वीतराग के निकट रह, रहत न राग विशेष ||25||
सीख खे तिहूँ लोक को, ये सुर दुन्दुभि नाद |
शिवपथ सारथ वाह जिन, भजहु तजहु परमाद ||26||
तीन छत्र त्रिभुवन उदित, मुक्तागण छवि देत |
त्रिविध रूप धर मनहु शशि, सेवत नखत समेत ||27||
(पद्धरि)
प्रभु तुम शरीर दुति रमन जेम, परपात पुंज जिम शुद्ध हेम |
अतिधवल सुजस रूपा समान, तिनके गुण तीन विराजमान ||28||
सेवहिं सुरेन्द्र क्र नमत भाल, तिन सीस मुकुट तज देहिं माल |
तुम चरण लगत लहलहे प्रीति, नहिं रमहिं और जन सुमन रीति ||29||
प्रभु भोग विमुख तन करम दाह, जन पार करत भवजल निवाह |
ज्यों माटी कलश सुपक्क होय, ले भार अधोमुख तिरहिं तोय ||30||
तुम महाराज निरधन निराश, तज तुम विभव सम जगप्रकाश |
अक्षर स्वभाव सु लिखे न कोय, महिमा भगवंत अनंत सोय ||31||
कोपियो कमठ निज बैर देख, तिन करी धूलि वर्षा विशेष |
प्रभु तुम छाया नहिं भई हीन, सो भयो पापी लम्पट मलीन ||32||
गरजंत घोर घन अंधकार, चमकंत विज्जु जल मूसल धार |
वरर्षन्त कमठ धर ध्यान रूद्र, दुस्तर करंत निज भव समुद्र ||33||
(वास्तु छंद)
मेघमाली मेघमाली आप बल फोरि |
भेजे तुरत पिशाच-गण, नाथ-पास उपसर्ग कारण |
अग्नि जाल झलकंत मुख, धुनिकरत जिमि मत्त वारण |
कालरूप विकराल तन, मुंडमाल हित कंठ |
ह्वे निशंक वह रंक निज, करे कर्म दृढ ढंग ||34||
(चौपाई छंद)
जे तुम चरण कमल तिहुंकाल, सेवहिं तजि माया जंजाल |
भाव-भगति मन हरष अपार, धन्य-धन्य जग तिन अवतार ||35||
भवसागर में फिरत अजान, मैं तुव सुजस सुन्यो नहिं कान |
जो प्रभु-नाम-मन्त्र मन धरे, ता सों विपति भुजंगम डरे ||36||
मनवांछित फल जिनपद माहीं, मैं पूरब भव पूजे नाहिं |
माया मगन फिर्यो अज्ञान, करहिं रंक-जन मुझ अपमान ||37||
मोहतिमिर छायो दृग मोहि, जन्मान्तर देख्यो नहिं तोहि |
जो दुर्जन मुझ संगति गहें, मरम छेद के कुवचन कहें ||38||
सुन्यो कान जस पूजे पायं, नैनन देख्यो रूप अघाय |
भक्ति हेतु न भयो चित चाव, दुखदायक किरिया बिन भाव ||39||
महाराज शरणागत पाल, पतित उधारण दीनदयाल |
सुमिरन करहूँ नाय निज शीश, मुझ दुख दूर करहु जगदीश ||40||
कर्म निकंदन महिमा सार, अशरण-शरण सुजस विस्तार |
नहिं सेये प्रभु तुमरे पाय, तो मुझ जन्म अकारथ जाय ||41||
सुर गन वन्दित दया निधान, जग तारण जगपति अनजान |
दुख-सागर तें मोहि निकासि, निर्भय थान देहु सुख रासि ||42||
मैं तुम चरण कमल गुण गाय, बहु विधि भक्ति करी मनलाय |
जनम-जनम प्रभु पाऊं तोहि, यह सेवाफल दीजे मोय ||43||
(बेसरी छंद - षटपद)
इहविधि श्री भगवंत, सुजस जे भविजन भाषहिं |
ते निज पुण्यभंडार, संचि चिर पाप प्रणासहिं ||
रोम-रोम हुलसंति अंग प्रभु गुण मन ध्यावहिं |
स्वर्ग संपदा भुज वेगि पंचमगति पाँवहिं ||
यह कल्याणमन्दिर कियो, भक्त की बुद्धि |
भाषा कहत, कारण समकित शुद्धि ||44||