हे! शुद्ध-बुद्ध जिन सिद्ध अबद्ध धाता |
आचर्यवर्य उवझाय सुसाधु सिन्धु
मैं बार-बार तुम पद पयोज बंदु ||1||
है मूलमन्त्र नवकार सुखी बनाता
जो भी पढ़े विनय से अघ को मिटाता |
है आद्य मंगल यही सब मंगलों में
ध्यायो इसे न भटको जग जंगलों में ||2||
सर्वग्य देव अरहंत परोपकारी
श्री सिद्ध वन्द्य परमातम निर्विकारी |
श्री केवली कथित आगम साधू प्यारे
ये चार मंगल, अमंगल को निवारे ||3||
श्री वीतराग अरहंत कुकर्मनाशी
श्री सिद्ध शाश्वत सुखी शिवधाम वासी |
श्री केवली कथित आगम साधू प्यारे
ये चार उत्तम, अनुत्तम शेष सारे ||3||
जो श्रेष्ठ हैं शरण मंगल कर्मजेता
आराध्य हैं, परम हैं, शिवपंथ नेता |
हैं वन्द्य खेचर, नरों, असुरों सुरों के
वे ध्येय पंचगुरु हों हम बालकों के ||5||