श्री सिद्ध पूजन

(दोहा)
परमब्रम्ह परमात्मा, परमज्योति परमेश |
परम निरंजन परम शिव, णमो परम सिद्धेश ||

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |

अष्टक

(सोरठा)
मोह तृषा दुख देई सो तुमने जीती प्रभो |
जल-सों पूजों नेह, मेरा रोग मिटाइयो ||

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |

हम भव-आताप माहिं, तुम न्यारे संसार तैं |
कीजे शीतल छाँहि, चन्दन सों पूजा करों ||

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |

हम औगुन समुदाय, तुम अक्षय सब गुण भरे |
पूजों अक्षत ल्याय, दोष नाश गुण कीजिए ||

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।

काम अग्नि है मोहि, निश्चय शील स्वभाव तुम |
पुष्प चढ़ाऊँ तोहि, सेवक की पावक हरो ||

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

हमें क्षुधा-दुख भूर, ज्ञान-खड्ग सों तुम हती |
मेरी बाधा चूर, नेवज सो पूजों तुम्हें ||

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।

मोह-तिमिर हम पास, तुम पै चेतन ज्योति है |
पूजों दीप-प्रकाश, मेरो तम निरवारियो ||

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

रूल्यो कर्म वन-जाल, मुक्ति माहिं तुम सुख करो |
खेऊँ धुप रसाल, मेरो तम निरवारियो ||

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

अंतराय दुखकार, तुम अनंत थिरता लिये |
पूजों फल धर सार, विघन टार शिवफल करो ||

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

हममें आठों दोष, जजों अरघ ले सिद्ध जी |
वसु गुण दीजे मोष, भक्त कर जोड़ो खड़ो ||

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

(दोहा)
आठ कर्म दृढ बंध-सों, नख-शिख बन्धो जान |
बंध रहित वसु गुण सहित, नमूं सिद्ध भगवान ||
(पद्धरि)
सुख सम्यक-दर्शन ज्ञानधरं, बलनन्त अगुरुलघु-बाधहरं |
अवगाह अमूरत नायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
अबलं अचलं अतुलं अटलं, अतलं अवचं अकुलं अमलं |
अजरं अमरं जगज्ञायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
निरभोग स्वभोग अरोग परं, निरयोग असोग वियोगहरं |
अरमं स्वरमं दुखघायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
सब कर्म कलंक अटंक अजं, नरनाथ सुरेश समूह जजं |
मुनि ध्यावत सज्जन-नायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
अविरुद्ध विशुद्ध प्रबुद्धमयं, सब जानत लोक अलोक चयं |
परमं धरमं शिवलायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
निरभेद अखेद अछेद लहा, निरद्वंद सुछंद अछंद महा |
अक्षुधा अतृषा अकषायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
असमं अजमं अतमं लहियं, अगमं सुखमं सुखदं गहियं |
यमराज की चोट बचायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
निरधाम सुधाम अकामयुतं, अविहार निहार-आहारच्युतं |
भवनाशन तीक्षण सायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
निरवर्ण अकर्ण अशर्ण नतं, अगतिं अमितं अक्षतं अरतं |
अस उत्तम भाव सुपायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
निररंग असंग अभंग सदा, अतयं अचयं अवयं सुखदा |
अमदं अगदं गुण ज्ञायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
अविषाद अनादि अवाद परं, भगवंत अनंत महंत परं |
तुम ध्येय महामुनि ध्यायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
निरनेह अदेह अगेह सुखी, निरमोह अकोह अलोह तुखी |
तिहुं लोक के ज्ञायक पायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||
पन्द्रह सौ भाग महा निवसैं, नव लाख के भाग जघन्य लसैं |
तनुवात के अंत सहायक हैं, सब सिद्ध नमों सुखदायक हैं ||

ॐ ह्रीं सम्यगदर्शन ज्ञान अनंत-दर्शन वीर्य सूक्ष्मत्व अवगाहनत्व अगुरुलघुत्व अव्याबाधत्व गुणविभूषित सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

(सोरठा)
बहुविधि नाम बखान, परमेश्वर सबहीं भजें |ज्यों का त्यों सरधान, द्यानत सवें ते बढ़े ||

(अडील्ल छंद)
अविनाशी अविकार परम रसधाम हो, समाधान सर्वग्य सहज अभिराम हो |
शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध अनादि अनंत हो, जगत शिरोमणि सिद्ध सदा जयवंत हो ||
ध्यान अगनि करि कर्म-कलंक सबै दहे, नित्य निरंजन देव सरूपी हो रहे |
ज्ञायक के आकार ममत्व निवारिके, सो परमातम सिद्ध नमूं सिर नायके ||

(दोहा)
अविचल ज्ञान प्रकाशतें, गुन अनंत की खान |
ध्यान धरै सो पाइये, परम सिद्ध भगवान ||

इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलि क्षिपेत

प्रिंट करें