श्री विमलनाथ जिनेन्द्र का अर्घ्य

आठों दरब संवार, मन सुखदायक पावने |
जजूं अरघ भर थार, विमल विमल शिवतिय रमण ||

ॐ ह्रीं श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||

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