जल-फल दरब मिलाय गाय गुन, आठों अंग नमाई |
शिव पदराज हेत हे श्रीपति, निकट धरूं यह लाई ||
वासुपूज्य वसुपूज तनुज पद, वासत सेवत आई |
बाल ब्रम्हचारी लखि जिनको, शिव तीय सनमुख धाई ||
ॐ ह्रीं श्री वासुपुज्य जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||