श्री अनंतनाथ जिनेन्द्र का अर्घ्य

शुचि नीर चन्दन शालिशंदन, सुमन चरुं दीव धरूं |
अरु धुप फल जुत अरघ करि, कर-जोग-जुत विनति करूं ||
जग पूज परम पुनीत मीत, अनंत संत सुहावनो |
शिव कंत वंत महंत ध्याऊँ, भ्रंत वंत नशावनो ||

ॐ ह्रीं श्री अनंतनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||

प्रिंट करें