जिनवाणी के ऑनलाइन संकलन का एक प्रयास
श्री पुष्पदंतनाथ जिनेन्द्र का अर्घ्य
जल-फल सकल मिलाय मनोहर, मन-वच-तन हुलसाय |
तुम पद पूजूं प्रीति लायके, जय जय त्रिभुवन राय ||
मेरी अरज सुनीजे, पुष्पदंत जिनराय, मेरी अरज सुनीजे ||
ॐ ह्रीं श्री पुष्पदंत जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
प्रिंट करें