जल चन्दन तंदुल प्रसून चरू, दीप धुप लेरी |
फल-जुत जजन करूं मन-सुख धरि, हरो जगत फेरी ||
कुन्थु सुन अरज दास केरी, नाथ सुन अरज दास केरी
भव सिन्धु पर्यो हो नाथ, निकारो बांह पकर मेरी ||
ॐ ह्रीं श्री कुंथुनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||