शुचि स्वच्छ पटीरं, गंध गहीरं, तंदुल शीरं पुष्प चरुं |
वर दीप धूपं, आनन्द रूपं, ले फल भूपं अर्घ करूं ||
प्रभु दीनदयालं, अरिकुल कालं, विरद विशालं, सुकुमालम |
हनि मम जंजालं, हे जगपालं, अर-गुणमालं वरभालम ||
ॐ ह्रीं श्री अरहनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||