आठों दरब साज शुचि चितहर, हरषि हरषि गुणगाई |
बाजत दम दम दम मृदंग गत, नाचत ता थेई थेई ||
परम धरम शम रमन धरम जिन, अशरन शरन निहारी |
पूजूं पाय गाय गुन सुंदर, नाचूं दे दे तारी ||
ॐ ह्रीं श्री धर्मनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||