बहुत बुलाया मैंने भगवन, अब मैं ही खुद आऊँगा|
नहीं सुनाया अब तक तुमको, अब निज व्यथा सुनाऊंगा ||
सुनकर मेरी व्यथा कथा को, हैं विश्वास पुकारोगे |
अनंत दुःख से व्याकुल मुझको, भव से पार लगाओगे ||
मल्लिनाथ हैं नाम तुम्हारा, दयासिन्धु कहलाते हो |
श्रद्धा से जो भक्त पुकारे, उसके हृदय समाते हो ||
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
द्र्व्यार्पण
(आडिल्ल छंद)
ज्ञान कलश में शुद्ध नीर निर्मल लिया |
मिथ्यामल धोने हेतु पद धार लिया ||
मल्लिनाथ जिनवर के दर्शन मैं करूं |
पूजन करके जन्म रोग को मैं हरूं ||1||
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
अनंत युग का प्यासा ज्ञान पिपासा है |
शांति शाश्वत मुझे मिलेगी आशा है ||
मल्लिनाथ जिनवर के दर्शन मैं करूं |
पूजन करके भवाताप को मैं हरूं ||2||
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
जन्म मरण की वेदना से रोता हूँ |
कर्म बंध के भार को मैं ढोता हूँ ||
मल्लिनाथ जिनवर के दर्शन मैं करूं |
पूजन करके अक्षय जिनपद को वरूं||3||
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचेन्द्रिय की अभिलाषाएं भटकाती |
ब्रम्ह रूप में लीं नही होने देती ||
मल्लिनाथ जिनवर के दर्शन मैं करूं |
पूजन करके ब्रम्ह पद में रमूं ||4||
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
पूर्ण शुद्ध चेतन चिन्मय चिद्रूप हूँ |
फिर भी जड़ सम्बन्ध किया विद्रूप हूँ ||
मल्लिनाथ जिनवर के दर्शन मैं करूं |
पूजन करके समता सर का पान करूं ||5||
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
दीप भू पर नभ में सूरज तारे हैं |
अहंकार हरने बेबस बेचारे हैं ||
मल्लिनाथ जिनवर के दर्शन मैं करूं |
पूजन करके ज्ञान दीप उर में धरूं ||6||
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
कर्म सदा मेरी बुद्धि को भ्रष्ट करें |
धुप चधाऊँ आज सारे कर्म जरें ||
मल्लिनाथ जिनवर के दर्शन मैं करूं |
पूजन करके वसु कर्म को नष्ट करूं ||7||
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
इन्डिय सुख के फल मैं व्याकुल हूँ |
प्रभु दर्श पा, शिव फल पाने आकुल हूँ ||
मल्लिनाथ जिनवर के दर्शन मैं करूं |
पूजन करके मोक्ष महापद मैं वरूं ||8||
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्घ्य अर्पण करके निज गुण में लीन रहूँ |
जिन समान ही शीघ्र नाथ अरिहंत बनूं ||
मल्लिनाथ जिनवर के दर्शन मैं करूं |
पूजन करके मुक्तिवधु को मैं वरूं ||9||
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचकल्याणक
देव मनाये कल्याण, आई शुभ की घड़ी |
आई शुभ की घड़ी, देखो मंगल घड़ी.... ||
अपराजित अनुत्तर छोड़ा, मिथिलापुर में आये |
निद्रा में शुभ स्वप्न देख, माँ प्रभावती सुख पाए ||
सुरपति करें प्रभु गुणगान, चैत्र सुदी एकम है महान |
कर लो जिनवर का गुणगान, आई शुभ की घड़ी....||1||
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लप्रतिपदायां गर्भमंगलमंडिताय श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मगसिर सुदी एकादशमी को, कुंभराज घर आये |
जन्मोत्सव में मंगल उत्सव, गा अभिषेक कराय ||
देव मनाय जनम कल्याण, ले गये पान्डु शिला महान |
कर लो जिनवर का गुणगान, आई जन्म की घड़ी....||2||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लैकादश्यां जन्ममंगलमंडिताय श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जन्मोत्सव के समय प्रभु ने, विद्युत् अस्थिर देखा |
जयंत पालकी में लेकर, सुर दल शालीवन पहुंचा ||
देव मनाये तप कल्याण, करने चले आतम कल्याण |
कर लो जिनवर का गुणगान, आई तप की घड़ी....||3||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लैकादश्यां तपोमंगलमंडिताय श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
अशोक तरु के नीचे प्रभु ने, केवलज्ञान उपाया |
चार घाति कर्मों को क्षयकर, समवशरण ही भाया ||
देव मनाये ज्ञानकल्याण, प्रभु की ध्वनि खिरी है महान |
कर लो जिनवर का गुणगान, आई ज्ञान की घड़ी....||4||
ॐ ह्रीं पौषकृष्णद्वितीययां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
फाल्गुन शुक्ला पंचम को अपराह्न समय जब आया |
सम्मेदाचल में संबल कूट से, महा मोक्ष पद पाया ||
देव मनाये मोक्ष कल्याण, पहुंचे जिनवर मुक्तिधाम |
कर लो जिनवर का गुणगान, आई मोक्ष की घड़ी....||4||
ॐ ह्रीं फाल्गुनशुक्लपंचम्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जाप्य
ॐ ह्रीं अर्हम श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय नमो नम: |
जयमाला
(दोहा)
मल्लिनाथ जिनराज की, जग में कीर्ति विशाल |
बाल ब्रम्हचारी प्रभो, नमन करूं त्रयकाल ||1||
(चौपाई)
वन्दन जिन श्री मल्लिनाथा, हम गाये तव गुण की गाथा |
भेष दिगम्बर तुमने धारा, वीतराग को नमन हमारा ||2||
प्रभु आप आतम रूचि जागी, बिन उपदेश नाथ बैरागी |
विद्युत् अस्थिर होते देखा, छोड़ दिया जग वैभव लेखा ||3||
जय श्री मल्लिनाथ हमारे, लाखों भविजन तुमने तारे |
जय-जय मुक्तिरमा पति देवा, सौ-सौ इंद्र करे तुम सेवा ||4||
जय आनन्द निधान जिनेशा, हरो अमंगल दोष अशेषा |
बाल ब्रम्हचारी जिनराई, मुक्तिरमा से प्रीत लगाई ||5||
कुमार वय में दीक्षा धारी, द्रव्य भाव हिंसा परिहारी |
मोह मल्ल को नाश किया है, निज आतम को जान लिया है ||6||
प्रभु सोलह कारण आराधे, तीर्थ प्रवर्तन सब सुख भासे |
मास पूर्व ही योग निराधा, योग रहित हो शिव को साधा ||7||
गणधर हुए अठ्ठाइस सारे, उन्हें त्रियोग से नमन हमारे |
मैं संयम की पाऊं नैया, शिवपथ के हो आप खिवैया ||8||
स्वानुभूति तरणी गम्भीरा, आये मोक्षपूरी के तीरा |
जिनवर काटे कर्म जंजीरा, चउ गतियों की नाशी पीरा ||9||
मैं भी ऐसा जीवन पाऊं, निकट आपके शीश झुकाऊं |
जपूँ सदैव प्रभु दिन रैना, जागे मेरी पुन्य सुसेना ||10||
महान जिन श्री मल्लिनाथा, नष्ट किया वसुविधि का खाता |
जिनवर मुक्तिपूरी के वासी, उसी पन्थ का मैं प्रत्याशी ||11||
प्रभुवर आत्म भवन में आये, अनंत सुख के उपवन पाए |
मल्लिनाथ पद शीश नवाये, प्रभु समान जिन पद हम पायें ||12||
(दोहा)
कलश चिन्ह लख चरण में, इंद्र करें जयकार |
सम्बल दो मल्लिनाथ, हो जाऊं भव पार ||13||
ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घयं निर्वपामीति स्वाहा ||
(घत्ता)
हे मल्लि जिनेश्वर, मेरे ईश्वर, भव-भव का संताप हरो |
नित पूज रचाऊं, ध्यान लगाऊं, भक्त को अब पूर्ण करो ||