स्थापना
(ज्ञानोदय छंद)
अरहनाथ के चरण कमल को निशदिन बारम्बार प्रणाम |
निष्कलंक निश्चल निष्कामी, निजानन्द निष्कल गुणधाम ||
जग आकर्षण छोड़ सभी मैं, आया जिनवर द्वार प्रभो |
पुण्योदय से आज मिले हो, कर देना उद्धार विभो ||1||
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
द्र्व्यार्पण
जल मल का करता नाश, जल वो ले आया |
हो कर्म कलंक विनाश, आश लिए आया ||
अरनाथ जिनेश महान, चरण शरण आया |
हो स्व-भेद विज्ञान, श्रद्धा उर लाया ||1||
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
चन्दन हैं जग विख्यात, तन आतप हारी |
मन का मेटो संताप, भव व्याधि घेरी ||2||
अरनाथ जिनेश महान...
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
नश्वर तन के अनुकूल, बहुविध कर्म करे |
शाश्वत आतम को भूल, रूप अनेक धरे ||3||
अरनाथ जिनेश महान...
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
यह पुष्पांजलि सुखकार, शील स्वभाव जगे |
भव सिन्धु के उस पार, मेरी नाव लगे ||4||
अरनाथ जिनेश महान...
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
यह चरू करूं मैं भेंट, ऐसा वर देना |
क्षुध व्याधि पूर्ण हो नष्ट, ऐसा कर देना ||5||
अरनाथ जिनेश महान...
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
सूरज उगते ही प्रात, तमको विनशाये |
यह दीप समर्पित आज, आतम उजियारे ||6||
अरनाथ जिनेश महान...
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रभु आतम ध्यान ली धूप, सम्यक ज्ञानमयी |
यह राग-द्वेष दुःख रूप, होऊं कर्मजयी ||7||
अरनाथ जिनेश महान...
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
फल चरण चढाऊं नाथ, शिवफल चाह रखूं |
कर्मों का नाश करके, शिवफल को निरखूं ||8||
अरनाथ जिनेश महान...
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
पद मद में हो आसक्त, निज पद को भूला |
जग हुआ दर्श अनुरक्त, मुक्तिद्वार खुला ||9||
अरनाथ जिनेश महान...
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्र अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचकल्याणक
(ज्ञानोदय छंद)
मंगल छिन्न स्वप्न सोलह, श्री मात सुमित्रा को आये |
अपराजित अनुत्तर तजकर, नगर हस्तिनापुर आये ||
फाल्गुन शुक्ल तृतीया को, नृपराज सुदर्शन हर्षाये |
सुरपति रत्नों को बरसाए, कल्याणक मन को भाए ||1||
ॐ ह्रीं फाल्गुनशुक्लतृतीयायां गर्भमंगलमंडिताय श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मगसिर शुक्ल चौदस के दिन, तीर्थंकर जग में आये |
इंद्र हाथ में स्वर्णिम सुंदर, सहस आठ कलशा लाये ||
सिद्धक्षेत्र जाने वाले को, पांडु शिला पे ले आये |
कोटी साढ़े बारह बाजे, तरह-तरह के बजवाये ||2||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लचतुर्द्श्यां जन्ममंगलमंडिताय श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मगसिर सुदी दशमी को स्वामी, मेघ नाश होते देखा |
वस्त्राभूषण तजे तुरत ही, नश्वर जग से मुख मोड़ा ||
चक्री पद को त्याग पालकी, वैजयन्ती में बैठ चले |
हजार नृप संग तेला करके, अरहनाथ मुनि बने ||3||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लदशम्यां तपोमंगलमंडिताय श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
कार्तिक सुदी बारस को प्रभु ने, जिनवर की पदवी पायी |
छयालीस गुण प्रकट हुए और क्षायिक नव लब्धि पायी ||
नाम कर्म की तीर्थंकर शुभ, प्रकृति आज उदय आयी |
अरहनाथ के जयकारों से, सारी धरती गुंजाई ||4||
ॐ ह्रीं कार्तिकशुक्लद्वाशयां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
चैत्र अमावस्या को स्वामी, नाटक कूट निर्वाण लिया |
एक शस मुनिनाथ साथ में, सम्मेदाचल धन्य किया ||
अव्याबाध सुखी होकर प्रभु, देह रहित स्वाधीन हुए |
पंचमगति को पाने हेतु, तव चरणों में लीन हुए ||5||
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णामावस्यायां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जाप्य
ॐ ह्रीं अर्हम श्रीअरनाथजिनेन्द्राय नमो नम: |
जयमाला
(दोहा)
अरहनाथ भवान को, मैं पूजूं धरूं ध्यान |
आप भक्ति की शक्ति से, करूं आतम कल्याण ||1||
(चाल-शेर)
अरहनाथ आपके चरण को मैं नित्य नमूं |
धर ध्यान आपका प्रभु भव सिन्धु से तरूं ||
देवाधिदेव अरहनाथ आपको नमूं |
हे सातवें चक्रेश मुनिनाथ को नमूं ||2||
हे वर्तमान तीर्थनाथ आपको नमूं |
हो कामदेव चौदहवें जिन आपको नमूं ||
सौधर्म इंद्र आपके चरणों में हैं नमे |
गणधर इंद्र आपकी भक्ति में है रमे ||3||
जो नित्य प्रभु आपके दर्शन को है पाता |
वो पाप नाश करके शीघ्र मोक्ष को है पाता ||
हे नाथ भक्ति आपकी मन से करे सदा |
उसको ण विघ्न व्याधियाँ सतातीं हैं कदा ||4||
पूजा करे विनय से अरहनाथ आपकी |
हो पूर्ण मनोकामना उस भक्त के मन की ||
शंकादि दोष टारके समदर्श को पाता |
वो आठ अंग धारता निज ज्ञान को पाता ||5||
तेरह प्रकार के चरित्र वो धार लेते |
शुद्धोपयोगी होय मुनि आत्म को ध्याते ||
वे ग्रीष्मकाम में गिरि शिखरों पे रहे हैं |
वर्षा ऋतू में तरु तले परिषह सहे हैं ||6||
हेमंत काल में मुनि बाहर शयन करें |
द्वादश प्रकार तप तपे मुनि को नमन करें ||
उपवास वास करते निज में रहें मुनीश |
चऊँ घाति घात करके पद पा गये हैं ईश ||7||
रचना हुई समवशरण की सब ताप अघहरा |
है तीस जिसमें श्रीकुन्थु मुख्य गणधरा ||
हे नाथ आपका सुयश सुना मैं आ गया |
मैं भी बनूं परमात्मा ये मन को भा गया ||8||
अज्ञान मान वश जो दोष हैं हुए |
हे नाथ माफ़ कीजिये तुम हो दया निधे ||
अरनाथ आपके चरण को नित्य मैं नमूं |
धर ध्यान आपका प्रभु भव-सिन्धु से तरूं ||9||
(दोहा)
मीन चिन्ह युत है चरण, वन्दन बारम्बार |
भावों से दर्शन करूं, हो जाऊं भव पार ||10||
ॐ ह्रीं श्रीअरनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घयं निर्वपामीति स्वाहा ||
(घत्ता)
हे अरहनाथ जी, मेरी अरजी, भव-भव का संताप हरो |
नित पूज रचाऊं, ध्यान लगाऊं, भक्त को अब पूर्ण करो ||