स्थापना
नमिनाथ प्रभु नमन करूं मैं, मन मेरा हर्षाया |
चरण कमल की पूजन करने, भाव हृदय में आया ||
चरण पखारूँ भक्ति भाव से, भव्य भावना भाऊँ |
दृढ वैराग्य जगा अंतर में, सिद्धालय में जाऊं ||1||
जिन भक्ति से प्रेरित होकर, नाथ शरण में आया |
मेरे जिनवर तुमको निज गृह, आज बुलाने आया ||
श्रध्दा गुण युत मम मन्दिर में, शाश्वत नाथ समाना |
निकट रहूँगा सदा आपके, नमिनाथ प्रभु आना ||2||
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
द्र्व्यार्पण
(ज्ञानोदय छंद)
आतम कर्मों से मलीन है इसको धोने आया हूँ |
प्रभो! आपकी वाणी को श्रद्धा से पीने आया हूँ ||
सुधा नीर लेकर आया प्रभु जन्म जरा मृत नाश करो |
नमिनाथ प्रभु दर्शन देकर, ज्ञान वेदी पर वास करो ||1||
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
जड़ द्रव्यों की चिंता में ही जीवन चिता बनाई है |
शीत द्रव्य का लेप किया पर शांति आप में पाई है ||
बावन चन्दन ले आया हूँ भवाताप प्रभु नाश करो |
नमिनाथ प्रभु दर्शन देकर, ज्ञान वेदी पर वास करो ||2||
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
आयु पल-पल घटती रहती मृत्यु से भय भारी है |
अक्षयपुर का वासी होकर नश्वर का अभिलाषी हूँ ||
अत: आज भावों से अक्षत लाया हूँ भव नाश करो |
नमिनाथ प्रभु दर्शन देकर, ज्ञान वेदी पर वास करो ||3||
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
निज स्वभाव की गंध मिली ना, पुष्प सुगंधी लाये हैं |
तन के सुंदर आकर्षण में नरकों के दुख पाए हैं ||
नाथ मुझे निष्काम बना दो कामबाण का नाश करो |
नमिनाथ प्रभु दर्शन देकर, ज्ञान वेदी पर वास करो ||4||
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
रसना की लोलुपता में ही शुद्धि का णा ध्यान रखा |
स्वातम रस का स्वाद लिया ना व्रत संयम से दूर रहा ||
निराहार जिन आप स्वभावी क्षुधा रोग मम नाश करो |
नमिनाथ प्रभु दर्शन देकर, ज्ञान वेदी पर वास करो ||5||
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
पर के दोष दिखे हैं लेकिन निज के दोष ण दिख पाये |
अंतर में है घना अँधेरा अटी स्वरूप ना दिख पाये ||
ज्ञान दीप प्रगटाओ स्वामी, मिथ्यात्म का नाश करो |
नमिनाथ प्रभु दर्शन देकर, ज्ञान वेदी पर वास करो ||6||
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
ये कर्म बहुत दुख देते हैं कर्मों को दोष दिया करता |
स्वयं नहीं पुरषार्थ जगाया भाव शुद्ध भी ना करता ||
धुप समर्पित करता हूँ, दुर्भावों का नाश करो |
नमिनाथ प्रभु दर्शन देकर, ज्ञान वेदी पर वास करो ||7||
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
भाव शुभाशुभ जब करता हूँ पुण्य-पाप फल पाता हूँ |
कर्म उदय में जब आते हैं व्याकुल हो फल पाते हैं ||
मोक्ष निवासी जिनवर मेरे, कर्म फलों का नाश करो |
नमिनाथ प्रभु दर्शन देकर, ज्ञान वेदी पर वास करो ||8||
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
सारे पद जग के झूठे हैं शाश्वत ना मिट पाते हैं |
शिवपद ही मन को भाया प्रभु तुम सा कहीं ना पाते हैं ||
मद का काम नही शिवपद में मम मद का पूर्ण विनाश करो |
नमिनाथ प्रभु दर्शन देकर, ज्ञान वेदी पर वास करो ||9||
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचकल्याणक
(ज्ञानोदय छंद)
विजयराज फल स्वप्न कहे, अपराजित तजकर प्रभु आये |
आश्विन कृष्ण द्वितीया के दिन, माता वप्रा उर आये ||
मिथिलापुर नगरी में प्रतिदिन, नूतन मंगल गान करें |
धन्य गर्भ कल्याण देवियाँ, मना-मनाकर नृत्य करें ||1||
ॐ ह्रीं आश्विनकृष्णद्वितीयायां गर्भमंगलमंडिताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
आषाढ़ वदी दशमी तिथि को जिनबाल धरा पर जन्म लिया |
चार प्रकार सुरों के गृह में वाद्य बजे, घट नीर लिए ||
माया पुत्र रचा इन्द्राणी, मां की गोद सुला आई |
बाल प्रभु को निरख निरख कर, पांडू शिला पर ले आई ||2||
ॐ ह्रीं आषाढ़कृष्णदशम्यां जन्ममंगलमंडिताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जनम दिवस के दिन प्रभुवर को, जाति स्मरण हुआ शुभ ज्ञान |
उत्तर कुरु पालकी बैठे, अंतर में निज आतम विमान ||
द्वादश भवन भाई प्रभु ने, किया चैत्रवन में जिन ध्यान |
एक सहस नृप ने दीक्षा ली, जय जय जय दीक्षा कल्याण ||3||
ॐ ह्रीं आषाढ़कृष्णदशम्यां तपोमंगलमंडिताय जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मगसिर सुदी एकादशमी को, कर्म घातिया नाश किया |
समवशरण में भव्यों के हित, प्रभुवर ने उपदेश दिया ||
मैंने भी सत्यपथ पहचाना, आतम का उद्धार किया |
परम ज्ञान कल्याण महोत्सव, आत्री करके नमन किया ||4||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लैकादश्मयां केवलज्ञानप्राप्ताय जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
वैशाख वदी चौदस को धारा, प्रभु ने प्रतिमा योग महान |
अंतिम शुक्ल ध्यान के द्वारा, पद पाया अनुपम निर्वाण ||
कूट मित्रधर से जिनवर, मुक्तिरमा से मैत्री की |
इसलिए सम्मेदाचल में, भव्य जनों ने यात्रा की ||5||
ॐ ह्रीं वैशाखकृष्णचतुर्दशयां मोक्षमंगलमंडिताय जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जाप्य
ॐ ह्रीं अर्हम श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय नमो नम: |
जयमाला
वंदनीय प्रभु आप हैं, नमिनाथ मुनिनाथ |
गुण मुक्त जयमाल हैं, आत्मसिद्धि के काज ||1||
जय-जय श्री नमिनाथ आप देव हैं महान |
त्रय ज्ञान धार जन्म लिया है दया निधान ||
इक्कीसवें तीर्थेश प्रभु आपको नमन |
मुझको भी करो पार प्रभु नाशिये करम ||2||
जाति स्मरण हुआ प्रभु वैराग्य हो गया |
तन से ममत्व छोड़ केशलोंच भी किया ||
श्री दत्तराज नृप ने आहार दे दिया |
पय धार देके पाप का संहार कर लिया ||3||
प्रभु शिष्य ण धरे ण चातुर्मास ही करे |
छद्मस्थ दशा मौन में विहार जो करें ||
जब घातिया को घात प्रभु केवली हुए |
नव ल्ब्धियों को पाय ज्ञान के रवि हुए ||4||
धरती पे ना चले अधर में ही गमन किया |
प्रभु भव्य के उद्धार को विहार है किया ||
प्रभु आपके सर्वांग से जो देशना खिरी |
गणधर कृपा हुई हमें जिनवाणी है मिली ||5||
आतम स्वरूप शुद्ध है निश्चय स्वरूप से |
वसु कर्म मल मलीन है व्यवहार रूप से ||
प्रभु आप ने ही वस्तु तत्व ज्ञान कराया |
प्रभु आप ने ही मोक्ष का ये पन्थ बताया ||6||
प्रभु सर्व कर्म नाश मुक्तिधाम पा लिया |
इंद्र ने भी हर्ष से उत्सव मना लिया ||
अग्नि कुमार देव ने संस्कार रचाया |
भक्ति से भस्म को तभी मस्तक पे लगाया ||7||
प्रभु नील कमल चिन्हित हैं चरण आपके |
मैं कर्म मल को धो सकूं तव दर्श को पा के ||
नमिनाथ तीर्थनाथ की वन्दना मैं करूं |
शीघ्र मोक्ष को वरून मैं बंध ना करूं ||8||
ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घयं निर्वपामीति स्वाहा ||
(घत्ता)
श्री नमी जिन स्वामी, हो जगनामी, भव-भव का संताप हरो |
नित पूज रचाऊं, ध्यान लगाऊं, भक्त को अब पूर्ण करो ||
इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलि क्षिपेत