कुंथुनाथ जिनराज दया के सिन्धु हैं |
नाथ दिवाकर आप सुधाकर इंदु हैं ||
प्राणीमात्र की रक्षा करते नाथ हैं |
इसलिए शत इंद्र झुकाते माथ हैं ||1||
सिद्धालय में जिनवर आप समा गए |
निज देहालय में परमेश्वर आ गए ||
प्रभो आपका भक्ति से आह्वाहन करूं |
आकर फिर ना जाना ये ही अर्ज करूं ||2||
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
द्र्व्यार्पण
प्रासुक जल अर्पण करने से, शुद्ध बनेंगे सोचा था |
किन्तु अशुभ भावों को हमने, नहीं मिटाना चाहा था ||
जनम मरण से व्याकुल होकर, वचनामृत पाने आये |
कुंथुनाथ जिनराज शरण में, प्रासुक जल पूजन लाये ||1||
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
कभी अतीत के विकल्प करते, कभी अनागत के संकल्प |
भव आताप बढ़ाते रहते, बीत गया यों काल अनंत ||
सिद्धक्षेत्र की शांति पाने, भवाताप हरने आये |
कुंथुनाथ जिनराज शरण में, श्रद्धा चन्दन ले आये ||2||
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
जगत उपाधि पाने हेतु, आधि व्याधि से ग्रसित रहे |
कुगुरू कुदेव कुधर्म की सेवा, मिथ्यादर्शन ग्रहीत धरें ||
इसलिए अविनाशी बनने, निज वैभव पाने आये |
कुंथुनाथ जिनराज शरण में, अखंड अक्षत ले आये ||3||
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
इन्द्रिय मन के विषय मनोहर, मिष्ट जहर जैसे लगते |
आत्म शील के नाशक हैं सब, सुख उत्पन्न सदा करते ||
चिन्मय रूप मनोहर पाने, आप्त काम होने आये |
कुंथुनाथ जिनराज शरण में, पुष्प अचेतन ले आये ||4||
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
तन के कारण किंचित किन्तु, मन के हित आहार किया |
तन की भूख तनिक से मिटती, क्षुधा व्याधि को बढ़ा दिया ||
क्षुधा रोग उपसर्ग मिटा दो, ज्ञान सुधा पाने आये |
कुंथुनाथ जिनराज शरण में, ले नैवेद्य चले आये ||5||
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
बाह्य रौशनी से बाहर में, सारा तमस मिटा डाला |
चेतन गृह में मोह बढ़ाकर, मिथ्यात्म से भर डाला ||
महाबली नृप मोह कर्म का, सर्वनाश करने आये |
कुंथुनाथ जिनराज शरण में, मणिमाय दीपक ले आये ||6||
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
धुप दशांगी चढ़ा चढ़ाकर, ध्रूम उड़ाई नभ तल में |
कर्म शक्ति को बढ़ा बढ़ाकर, भटक रहे भव-वन में ||
तप अग्नि में कर्म काठ को नाथ जलाने हैं आये |
कुंथुनाथ जिनराज शरण में, धुप सुगंधी ले आये ||7||
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
कर्तापन से कार्य जगत में, किये भुत दुःख पाया है |
फल पाने की इच्छा ने ही, आतम को तडपाया है ||
जग के फल दुखदायी तजकर, शिवफल पाने हैं आये |
कुंथुनाथ जिनराज शरण में, शुद्ध मनोहर फल लाये ||8||
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
पर द्रव्यों का भोग अभी तक, किया भुत मैंने स्वामी |
पर पद की अभिलाषा में ही, जीवन व्यर्थ किया स्वामी ||
जड़ वैभव को चढ़ा आज, चैतन्य विभव पाने आये |
कुंथुनाथ जिनराज शरण में, अर्घ्य बनाकर ले आये ||9||
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचकल्याणक
श्रीमती को सोलह सपने दिखलाए |
श्रावण वदी दशमी को गर्भ में आये ||
तीनों पद के धारी प्रभुवर धन्य हैं |
नगर हस्तिनापुर भी लगता रम्य हैं ||1||
ॐ ह्रीं श्रावणकृष्णदशम्यां गर्भमंगलमंडिताय श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सूर्यसेन राजा के घर मी जनम लिया |
एकम सुदी वैशाख दिवस पावन किया ||
कामदेव तेरहवें रूप मनहारी |
पांडू शिला अभिषेक हुआ अतिशयकारी ||2||
ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लप्रतिपदायां जन्ममंगलमंडिताय श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जाति स्मरण से प्रभु आप संयम धरा |
सब संसार असार जाना तप निखरा ||
विजय पालकी चढ़े चले निर्जन वन में |
तिलक तरु के नीचे प्रभुवर तप करने ||3||
ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लप्रतिपदायां तपोमंगलमंडिताय श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
चैत्र शुक्ला तृतीया घाति नष्ट किया |
समवशरण को रच कुबेर हर्षित हुआ ||
शिवपथ बतलाया प्रभो ने ज्ञान दिया |
दिव्यध्वनि से प्रभु विश्व कल्याण किया ||4||
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लातृतीयायां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
ध्यानाग्नि से अष्ट कर्म को दग्ध किया |
एकम सुदी वैशाख मुक्ति वरण किया ||
श्री सम्मेदाचल से जिनवर सिद्ध हुए |
कूट ज्ञानधर गिरिवर के जय बोल रहे ||
ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लप्रतिपदायां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
कुंथुनाथ भगवान हैंम करुना के अवतार |
इस असार संसार में, प्रभु भक्ति ही है सार ||1||
(पद्धरि)
जय कुंथुनाथ हे जगन्नाथ, करुणा के सागर प्राणीनाथ |
जय कुमति निकंदन, जे कल्मष भंजन कुंथुनाथ ||2||
जय सुख वारिधि हे कुंथुनाथ, गुणवंत हितंकर कुंथुनाथ |
जय शिवरमणी के प्राणनाथ, छटवें चक्रेश्वर कुंथुनाथ ||3||
जय श्रीमती नंदन कुंथुनाथ, पितु सूर्यसेन सुत कुंथुनाथ |
पैंतीस गणधर थे आप नाथ, थे मुख्य स्वयम्भू मुनीनाथ ||4||
हैं कई हजार शिष्यों के नाथ, श्रोता नर नारी इन्द्रनाथ |
अष्टादश दोष विमुक्त नाथ, प्रभु नंत चतुष्टय युक्त नाथ ||5||
मोहरिजयी श्री कुंथुनाथ, शत इंद्र नमाते शीश नाथ |
चिन्त्य चिंतामणी आप नाथ, कुन्थ्वादि जीव के दया नाथ ||6||
जय कौरव वंशी कुंथुनाथ, अज चिन्ह चरण है आप नाथ |
मैं तव चरणों में नमूं माथ, मुक्ति तक देना साथ नाथ ||7||
प्रभु मोक्षनगर में करें वास, जिनपदवी की बस लगी आस |
जिनराज दर्श की अभिलाष, वसु कर्म दुष्ट का करूं नाश ||8||
अब हो जाऊं स्वाधीन नाथ, इसलिए नवाऊँ आज माथ |
प्रभु सादर सविनय नमन आज, जयमाला अर्पण मुक्ति काज ||9||
(दोहा)
नन्त चतुष्टय लीन हैं, चित स्वभाव अविकार |
मुझ पर भी कर दो कृपा, करूं भवोदधि पार ||10||
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घयं निर्वपामीति स्वाहा ||
(घत्ता)
श्री कुन्थु जिनेश्वर, हे करुनेश्वर, भव-भव का संताप हरो |
नित पूजा रचाऊँ, ध्यान लगाऊं, भक्त को अब पूर्ण करो ||