स्थापना
(नरेंद्र छंद)
श्री सुपार्श्व प्रभु के चरणों में, पूजन करने आया |
चिदभावों को विशुद्ध करके, कर्म नशाने आया ||
दर्श किया तो लगा मुझे यों, सिद्धाल्य को पाया |
हृदय कमल में बस जाओ प्रभु, भक्ति सुमन ले आया ||1||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
द्र्व्यार्पण
(स्र्गविनि छंद)
जन्म और मृत्यु का रोग भारी प्रभो |
सब मिटा दो अहो दुखहारी विभो ||
आज भावों से पूजा करूंगा प्रभो |
जन्म का नाश निश्चित करूंगा विभो ||1||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
कर्म आताप से नाथ जर्जर हुआ |
शन्ति मुझको मिली जबसे दर्श हुआ ||
आज भावों से पूजा करूंगा प्रभो |
भव का संताप नाश करूंगा विभो ||2||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
जो अभी तक पाया वो नाश हुआ |
आपको देख शाश्वत का भान हुआ ||
आज भावों से पूजा करूंगा प्रभो |
पद अक्षय को निश्चित करूंगा विभो ||3||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
भा रही थी मुझे काम बंध कथा |
आपके दर्श से भा रही आत्मा ||
आज भावों से पूजा करूंगा प्रभो |
शुद्ध आतम का दर्श करूंगा विभो ||4||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
भूख व्याधि मुझे नाथ तडपा रही |
तृष्णा नागिन प्रभु जी डंसी जा रही ||
आज भावों से पूजा करूंगा प्रभो |
अक्ष मन के विषय को तजूँगा विभो ||5||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
मोह माया का तूफान भटका रहा |
ज्ञान नभ में मेघ मंडरा रहा ||
आज भावों से पूजा करूंगा प्रभो |
आप सम पूर्ण ज्ञानी बनूंगा विभो ||6||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
कर्म बंधन की कारा में कब से पड़ा |
नाथ मुझको छुड़ा लो कब से खड़ा ||
आज भावों से पूजा करूंगा प्रभो |
अष्ट कर्मों का नाश करूंगा विभो ||7||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
यूं ही जीवन गंवाया है निष्फल रहा |
राग-द्वेष ने लूटा है उपवन महा ||
आज भावों से पूजा करूंगा प्रभो |
मोक्षलक्ष्मी का स्वामी बनूंगा विभो ||8||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
आप ही मोक्षलक्ष्मी के स्वामी महा |
भव से तारो मुझे मैं व्यथित हूँ यहाँ ||
आज भावों से पूजा करूंगा प्रभो |
अर्चना से जिनेश्वर बनूंगा विभो ||9||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचकल्याणक
(स्रग्विनी छंद)
भाद्र शुक्ला की षष्ठी मनोहर अति |
गर्भ में आ गये तीन जग के पति ||
स्वप्न को देख माँ पृथ्वी हर्षा गई |
जय सुपार्श्व प्रभो देवियाँ कह रही ||1||
ॐ ह्रीं भाद्रपदशुक्लषष्ठयां गर्भमंगलमंडिताय श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जन्म वाराणसी में प्रभु ने लिया |
सुप्रतिष्ठ के गृह को पवित्र किया ||
ज्येष्ठ शुक्ल की बारस तिथि आ गई |
अर्व आनंद की छटा ही छा गई ||2||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठशुक्लद्वादश्यां जन्ममंगलमंदिताय श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जन्म उत्सव ही दीक्षा में बदला तभी |
राग पथ त्याग वैराग्य धारा तभी ||
रूप हैं निर्विकारी महाव्रत धरें |
श्री सुपार्श्व प्रभुजी की जय-जय करें ||3||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठशुक्लद्वादश्यां तपोमंगलमंडिताय श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
कृष्ण फाल्गुन की षष्ठी तिथि आई |
नाशे चउ घातिया निज निधि मिल गई ||
हुई रचना समोशरण की सुखकारी |
ध्वनी सुपार्श्व प्रभुवर की है हितकारी ||4||
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णषष्ठयां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सप्तमी कृष्ण फाल्गुन की जब आई |
वसु विधि नाशकर शिवरमा मिल गई ||
मोक्ष का धाम कूट प्रभास रहा |
दर्श कर पा रहे यात्री शांति महा ||5||
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णसप्तम्यां मोक्षमंगलमंडिताय जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जाप्य
ॐ ह्रीं अर्हम श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय नमो नम: |
जयमाला
जय सुपार्श्व सप्तम तीर्थकर, दीनानाथ कहाते हो |
हम अज्ञानी रागी-द्वेषी, तुम जगनाथ कहाते हो ||
स्वस्तिक चिह्नित पद कमलों में, करते वन्दन बारम्बार |
श्री सुपार्श्व जिनराज हमारे, करते हैं भविजन को पार ||1||
कहूं नाथ क्या आज आपसे, मैं दुखिया भववासी हूँ |
तेरी अनुपम करुना का ही, नाथ हुआ अभिलाषी हूँ ||
आज आपकी महिमा सुनकर, आया हूँ श्री चरणों में |
कृपा आपकी हो जाये तो, लीन रहूँगा चरणों में ||2||
नहीं सुनोगे मेरी अरजी, और कहाँ मैं जाऊंगा |
अन्य आपसा सच्चा भगवन, और कहाँ मैं पाऊँगा ||
भटक रहा हूँ भव-वन में, सन्मार्ग मुझे अब दे देना |
कौन सुनेगा जग में मेरी, नाथ मुझे अपना लेना ||3||
बहुविध उपसर्गों को सहकर, जगत पूज्य अरहन्त हुये |
उर्ध्व मध्य और अधोलोक से, प्रभु आप जगवन्द्य हुये ||
पंचानवे गणधर प्रभु के थे, मीनार्या थी प्रमुख महान |
बारह कोठे में श्रोतागण, सुन वाणी करते कल्याण ||4||
अरिहंत पद पाकर प्रभु ने, सप्त तत्व उपदेश दिया |
राग-द्वेष से भव बढ़ता है, जीवों को संदेश दिया ||
श्रीसुपार्श्व जिनवर को पूजूं, नित्य उन्हीं का ध्यान करूं |
रागादिक का नाश करूं मैं, मुक्तिवधु अविराम वरूं ||5||
जिसने भी तव चरण धुल को, अपने शीश चढ़ाया है |
महा भयानक भव सागर से, उसको पार लगाया है ||
तेरे उद्धारक चरणों पर, नाथ मेरी बलिहारी है |
वीतराग सर्वग्य हितंकर, पूर्ण ज्ञान के धारी हैं ||6||
(दोहा)
यद्यपि दोष का कोष हूँ, अज्ञानी हूँ नाथ |
फिर भी भक्ति प्रबल है, चरण नमाऊं माथ ||7||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घयं निर्वपामीति स्वाहा ||
(घत्ता)
हे सुपार्श्व स्वामी, अन्तर्यामी, भव-भव का संताप हरो |
नित पूज रचाऊं, ध्यान लगाऊं, भक्त को अब पूर्ण करो ||