श्री श्रेयांसनाथ जिन पूजन

स्थापना

हे श्रेयांसनाथ मेरे भगवन! मैं श्रेय पन्थ पाने आया |
मैं चला अभि तक मोह पन्थ, भगवंत संत को ना पाया ||
जिन रूप को नहीं जाना मैंने, कैसे वसु द्रव्य सजाऊं मैं |
श्रद्धा का थाल लिया कर में, हे स्वामी तुम्हे पुकारूं मैं ||
मैंने मन आँगन स्वच्छ किया, विशवास प्रभुजी आयेंगे |
प्रभु काल अनादि से सोये, बालक को आज जगायेंगे ||

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |

द्र्व्यार्पण

उत्तम क्षमा का जल नहीं, पिया मेरे प्रभो |
कषायों की कलुषता मिटी नहीं प्रभो ||
जन्मादि रोग नाशने आ गया शरण |
हे श्रेयनाथ दूर कीजिये जन्म मरण ||1||

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |

शीतल सुगंध द्रव्य लेप भी किया प्रभो |
निज आत्मा का ताप भी मिटा नहीं प्रभो ||
राग ताप नाशने आ गया शरण |
हे श्रेयनाथ दूर कीजिये जन्म मरण ||2||

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |

संयोग औ वियोग का ये सिलसिला रहा |
उत्पन्न जो हुआ उसी का नाश भी हुआ ||
गुण अखंड पाने हेतु आ गया शरण |
हे श्रेयनाथ दूर कीजिये जन्म मरण ||3||

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।

श्रद्धा बिना ही धर्म को करता रहा प्रभो |
निज ब्रम्ह रूप को नहीं लखा मेरे प्रभो ||
कामबाण नाशने आ गया शरण |
हे श्रेयनाथ दूर कीजिये जन्म मरण ||4||

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

तृष्णा महाभयंकरी है नागिनी प्रभो |
जिन ज्ञान नागदमनी से बचाइए प्रभो ||
तृष्णा का रोग नाशने आ गया शरण |
हे श्रेयनाथ दूर कीजिये जन्म मरण ||5||

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।

मोहान्धकार का विनाश कीजिये प्रभो |
दैदीप्यमान पूर्णज्ञान दीजिये प्रभो ||
ज्ञान दीप्ति पाने हेतु आ गया शरण |
हे श्रेयनाथ दूर कीजिये जन्म मरण ||6||

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

मैं पाप कर्म का विनाश कर नहीं सका |
चिर काल से थका हुआ आप दर रुका ||
अष्ट कर्म नाश हेतु आ गया शरण |
हे श्रेयनाथ दूर कीजिये जन्म मरण ||7||

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

मैं पाप और पुण्य फलों में लिप्त था |
बोया बबूल और आमा चाहता रहा ||
मोक्ष फल की भावना से आ गया शरण |
हे श्रेयनाथ दूर कीजिये जन्म मरण ||8||

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

स्वानुभूति दिव्य अर्घ्य आपके समीप हैं |
क्या चढाऊँ अर्घ्य आपको विदित है ||
सिद्ध पद के हेतु प्रभु आ गया शरण |
हे श्रेयनाथ दूर कीजिये जन्म मरण ||9||

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

पंचकल्याणक

माता विमला गर्भ पधारे, पुष्पोत्तर से गमन किया |
ज्येष्ठ वदी मावस को सारे, देव लोक ने गमन किया ||
सिंहपूरी में पिता विमल के, गृह में जय-जयकार किया |
मात गर्भ में प्रभुवर राजे, किंचित भी नहीं कष्ट दिया ||1||

ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णमावस्यायां गर्भमंगलमंडिताय श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

फाल्गुन वदी ग्यारस को जन्मे, देवसन भी कांप उठे |
शचि कहे जिनवर से स्वामी, मेरा जन्म मरण छुटे ||
शीतल मंद सुगन्धित वायु, बहती है हौले-हौले |
क्षीरोदधि का क्षीर नीर ले, देव सभी जय-जय बोले ||2||

ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णैकाद्श्यां जन्ममंगलमंदिताय श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

रुकी बहारें ऋतु बसंत की, देख प्रभु वैराग्य धरा |
फाल्गुन कृष्ण ग्यारस के दिन, श्रवण हृक्ष में तप धरा ||
विमलप्रभा पालकी मनोहर, वन पहुंची सुर नर के साथ |
किये तीन उपवास साथ में, एक हजार हुए मुनिनाथ ||3||

ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णैकाद्श्यां तपोमंगलमंडिताय श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

माघ वदी मावस अपराह्ने, पूर्णज्ञान का सूर्य उगा |
पंच सहस धनु उन्नत नभ में, समवशरण की लगी सभा ||
दिव्यध्वनि से श्री जिनवर ने, जीवों का उद्धार किया |
जय श्रेयांसनाथ तीर्थंकर, देवों ने गुणगान किया ||4||

ॐ ह्रीं माघकृष्णामावस्यायां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

सावन के महीने में शीतल, पूर्ण चन्द्र का उदय हुआ |
सम्मेदाचल संकूल कूट से, जिन श्रेयांस को मोक्ष हुआ ||
एक सहस मुनि साथ पधारे, शिवलक्ष्मी भी धन्य हुई |
मोक्ष कल्याणक महिमा मेरे, पुण्योदय से गम्य हुई ||5||

ॐ ह्रीं श्रावणशुक्लपूर्णिमायां मोक्षमंगलमंडिताय जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जाप्य

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय नमो नम: |

जयमाला

(दोहा)
श्री श्रेयांस जिनेश को, नमन करूं शत बार |
मात्र आप आधार हैं, देख लिया संसार ||1||

(चाल-शेर)
जय श्रेयनाथ आप श्रेय पथ दिखाते |
संसारी जीव आप पाद पद्म में आते ||
हे विश्व-वन्द्य श्रेयनाथ अर्चना करें |
हो आपको नमोस्तु नाथ वन्दना करें ||2|| हे...
जो भव्य जीव आप तीर्थ स्नान करें हैं |
वे अष्ट कर्म मल समूह नष्ट करें हैं ||3|| हे...
हैं ग्यारवें तीर्थंकरा श्रेयांस जिनवरा |
प्रभु आप में रहे नहीं अब दोष अठारा ||4|| हे...
हे नाथ जग प्रकाश एक रूप आप ही |
उपयोग नंत ज्ञान दर्श रूप भी ||5|| हे...
जिन दर्श ज्ञान द्रित्त से त्रिरूप हो तुम्हीं |
आर्ह्न्तय के अनंत चतुष्टय स्वरूप भी ||6|| हे...
पंच परम इष्ट ब्रह्म पंच रूप हो |
जीवादि द्रव्य जानते तुम षट स्वरूप हो ||7|| हे...
सातों नयों की देशना दी सात रूप हो |
आठों गुणों से युक्त सिद्ध आठ रूप हो ||8|| हे...
क्षायिकी नव लब्धियों से नव स्वरूप हो |
दश धर्म के धारी जिनेश दश स्वरूप हो ||9|| हे...
ग्यारह प्रतिमाओं का उपदेश दे दिया |
भक्तों ने ग्यारहवें जिनेश को नमन किया ||10|| हे...
जिनराज दिव्य देशना सौभाग्य से मिली |
पावन घड़ी है आज हृदय की कली खिली ||11|| हे...
कोई नहीं जिनेश इस जग में हमारा |
चारों गति में देख लिया तू ही सहारा ||12|| हे...

(दोहा)
अगणित गुण गण के धनी, मुक्तिरमा के नाथ |
मेरा भी कल्याण हो, हूँ त्रियोग नथ माथ ||13||

ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घयं निर्वपामीति स्वाहा ||

(घत्ता)
हे श्रेय जिनेश्वर, श्री परमेश्वर, भव-भव का संताप हरो |
नित पूज रचाऊं, ध्यान लगाऊं, भक्त को अब पूर्ण करो ||

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