(स्थापना)
(ज्ञानोदय छंद)
जय जय पद्म जिनेश्वर मेरे, पावन पद्माकर सुखधाम |
भव दुखहर्ता, मंगलकर्ता, छटवें तीर्थंकर अभिराम ||
हरो अमंगल प्रभु अनादि का, भाव यही लेकर आया |
मन मन्दिर है मेरा सूना, आह्वाहन करने आया ||
वीतराग सर्वग्य हितैषी, पद्म जिनेश्वर प्रभु महेश |
पूजा को स्वीकारो स्वामी, दिखला दो मुक्ति का देश ||
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय! अत्र तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
द्र्व्यार्पण
(ज्ञानोदय छंद)
जन्म मरण की इस ज्वाला में, अब तक मैं जलता आया |
सिन्धु नीर से बुझी न ज्वाला, अंत: भक्ति का जल लाया ||
श्री पद्माकर पद्म जिनेशा, तक दर्शन कर हर्षाया |
आत्म शांति पाने को भगवन, शरण तिहारी आया हूँ ||1||
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
भवाताप से व्यथित हुआ हूँ, अगणित सुख पाए स्वामी |
तप्त हृदय शीतल कर दो, संताप हरो अन्तर्यामी ||2||
श्री पद्माकर पद्म जिनेशा...
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
नश्वरता में ही सुख माना, अक्षय पद ना जाना है |
दर्श आपका पाया जबसे, जिन पद पाना ठाना है ||3||
श्री पद्माकर पद्म जिनेशा...
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
इन्द्रिय सुख के महाजाल में, भगवन फंसकर तडप रहा |
मुझे बचा लो विषय काम से, तुम्हें छोड़कर जाऊं कहाँ ||4||
श्री पद्माकर पद्म जिनेशा...
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
तरह तरह के व्यंजन खाकर, क्षुधा मन की न मिट पाई |
मन की इच्छाओं पर स्वामी, अब तक विजय नहीं पाई ||5||
श्री पद्माकर पद्म जिनेशा...
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
मोह महातम नाश हेतु, यह दीपक भेंट चढ़ाना है |
अंतर घट में हो उजियारा, ज्ञान ज्योति प्रगटाना है ||6||
श्री पद्माकर पद्म जिनेशा...
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
पर परणति के नाश हेतु, यह धुप सुगन्धित लाया हूँ |
अष्ट कर्म को जला जलाकर, धूम्र उड़ाने आया हूँ ||7||
श्री पद्माकर पद्म जिनेशा...
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
दुष्कर्मों के फल को भोगा, चतुर्गति में किया भ्रमण |
मोक्ष महाफल पाने भगवन, आया तेरी चरण शरण ||8||
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
जल से फल का वैभव सारा, आज चढ़ने आया हूँ |
निज अनर्घ्य पद देना स्वामी, भव संजोकर लाया हूँ ||9||
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचकल्याणक
माघ कृष्ण षष्ठी के दिन, हुआ गर्भ कल्याण महान |
पन्द्रह मास रतन बरसाये, किया सुरों ने मंगलगान ||
उपरिम ग्रैवेयक से आये, मात सुसीमा हर्षाई |
धरणराज की शुभ नगरी में, अतिशय खुशियाँ है छाई ||1||
ॐ ह्रीं माघकृष्णषष्ठयां गर्भमंगलमंडिताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
कार्तिक कृष्ण तेरस के दिन, त्रिभुवन में आनन्द हुआ |
कौशाम्बी नगरी में आकर, देवों ने जयगान किया ||
मेरु सुदर्शन पांडुक वन में, हर्षित हो अभिषेक किया |
सुरान्ग्नाओं ने प्रभु आगे, थिरक-थिरक के नृत्य किया ||2||
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णत्रयोद्श्यां जन्ममंगलमंदिताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जाति स्मरण जब हुआ प्रभु को, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी थी |
लौकांतिक देवों ने आकर, तप संयम की अर्चा की ||
पद्मप्रभु ने मुनिव्रत धारा, जिन पद से अनुराग किया |
पर तत्वों से चित्त हटाया, जग वैभव को त्याग दिया ||3||
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णत्रयोद्श्यां तपोमंगलमंडिताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
चैत्र शुक्ल की पूर्णमासी थी, चार घाति अवसान किया |
पाकर केवलज्ञान प्रभु ने, भव बंधन का नाश किया ||
सप्त तत्व का समवशरण में, किया प्रभु सुंदर उपदेश |
षट द्रव्यों के प्रभु प्रणेता, जय-जय जयप्रभु पद्म जिनेश ||4||
ॐ ह्रीं चैत्रशुल्कपूर्णिमायां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी के दिन, अष्ट कर्म का नाश किया |
मोहन कूट सम्मेदाचल से, सिद्धालय में वास किया ||
अंतिम शुक्लध्यान धरकर जब, उर्ध्व लोक में किया गमन |
सादि अनंत सिद्ध पद पाया, भव्य जनों ने किया नमन ||5||
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णचतुर्थ्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जाप्य
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय नमो नम: |
जयमाला
(दोहा)
पद्म चिन्ह शोभित चरण, नमूं अनंतों बार |
प्रभु कृपा हो भक्त पर, करें भवाम्बुधि पार ||1||
(ज्ञानोदय छंद)
जय-जय पद्मप्रभ जगनामी, आप सर्व जग हितकारी |
शरण आ गया नाथ आपकी, दुःख ष रहा अति भरी ||
बहु आरम्भ परिग्रह से प्रभु, नरक गति में जा पहुंचा |
दुःख सहे अनगिनती स्वामी, वचनों से नहि जाए कहा ||2||
वैतरणी में गिरा कभी तो, सेमर तरु असि धार बने |
क्षुधा तृषा से व्यथित हुआ औ, शीत उष्ण के दुःख सहे ||
राग भाव से अपना माना, वो ही बैरी बने वहां |
आत्रध्यान से मरकर स्वामी, पशु गति में जा पहुंचा ||3||
एकेंद्रिय भी कभी बना तो, दुष्कर्मों का बोझ सहा |
देव गति भी पाकर भगवन, विषय भोग में मस्त रहा ||
प्रभु पूजन भक्ति नहीं कीनी, पर परिणति में भटक गया |
दुर्लभ नर तन पाकर प्रतिफल, कर्म फलों में अटक गया ||4||
प्रभु आपने जग वैभव को, ही जानकर ठुकराया |
आत्म साधना के साधन से, परम शुद्ध पद को पाया ||
भव्य जनों को समवशरण में, वस्तु तत्व का ज्ञान दिया |
है अनंत उपकार आपका, परमातम का ज्ञान दिया ||5||
एक शतक ग्यारह थे गणधर, उनको मैं भी नमन करूं |
सामी भव धर उर अंतर में, राग द्वेष का हनन करूं ||
पद्म जिनेश्वर आप कृपा से, शरण तिहारी आया हूँ |
बालक पर उपकार करो प्रभु, तुम सम बनने आया हूँ ||6||
नाथ आपने भूले भटके, भव्यों को शिव द्वार दिया |
सिद्धालय की आशा लेकर, मैं भी चरण शरण आया ||
बाल सूर्य सम वर्ण आपका, पद्मप्रभ जिनराज महान |
जयमाला अर्पण करता हूँ, पा जाऊं मैं भी निर्वाण ||7||
ॐ ह्रीं श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घयं निर्वपामीति स्वाहा ||
(घत्ता)
श्री पद्म जिनेशा, नमित सुरेशा, भव-भव का संताप हरो |
नित पूज रचाऊँ, ध्यान लगाऊं, विद्यासागर पूर्ण करो ||