सुर तन मुकुट रतन छवि करैं, अंतर पाप तिमिर सब हरैं |
जिन पद वन्दों मन-वच-काय, भव जल पतित उद्धरन सहाय ||1||
श्रुत पारग इन्द्रादिक देव, जाकी थुति किनी कर सेव |
शब्द मनोहर अरथ विशाल, तिस प्रभु की वरनों गुण-माल ||2||
विबुध वन्द्य पद मैं मति हीन, हो निल्ल्ज थुति मनसा कीन |
जल प्रतिबिम्ब बुद्ध को गहै, शशि-मंडल को बालक ही चहै ||3||
गुण-समुद्र तुम गुण अविकार, कहत न सुर गुरु पावैं पार |
प्रलय-पवन उद्धत जल-तन्तु, जलधि तिरै को भुज बलवन्तु ||4||
सो मैं शक्ति-हीन थुति करूं, भक्ति-भाव वश कुछ नहीं डरूं |
ज्यों मृगि निज सुत पालन हेतु, मृगपति सन्मुख जाय अचेत ||5||
मैं शठ सुधी हँसन को धाम, मुझ तव भक्ति बुलावै राम |
ज्यों पिक अम्ब कली परभाव, मधु ऋतु मधुर करै आराव ||6||
तुम जस जंपत जन छिनमाहिं, जनम-जनम के पाप नशाहिं |
ज्यों रवि उगै फटे तत्काल, अलिवत, नील निशा-तम-जाल ||7||
तव प्रभावतैं कहूं विचार, होसी यह थुति जन-मन-हार |
ज्यों जल कमल-पत्र पै परै, मुक्ताफल की दुति विस्तरै ||8||
तुम गुन-महिमा हत-दुःख-दोष, सो तो दूर रहो सुख-पोष |
पाप-विनाशक है तुम नाम, कमल-विकासी ज्यों रवि-धाम ||9||
नहिं अचम्भ जो होहिं तुरंत, तुम से तुम गुण वरणटी संत |
जो अधीन को आप समान, करै न सो निन्दित धनवान ||10||
इकटक जन तुम को अविलोय, अवर विषैं रति करे न सोय |
को करि क्षीर-जलधि जल पान, क्षार नीर न पीवै मतिमान ||11||
कहाँ तुम मुख अनुपम अविकार, सुर-नर-नाग नयन-मनहार |
कहाँ चन्द्र-मंडल सकलंक, दिन में ढ़ाक-पत्र सम रंक ||13||
पूरन चंद ज्योति छविवंत, तुम गुन तीन जगत लघंत |
एक नाथ त्रिभुवन आधार, तिन विचरत को करै निवार ||14||
जो सुर-तिय विभ्रव आरम्भ, मन न डिग्यो तुम तौ न अचंभ |
अचल चलावै प्रलय समीर, मेरु-शिखर डगमगे न धीर ||15||
धूम रहित वाती गत नेह, परकाशै त्रिभुवन-घर एह |
वात-गम्य नाहिं परचंड, अपर दीप तुम बलो अखंड ||16||
छिपहु न लुपहु राहु की छाहिं, जग परकाशक हो छिन माहिं |
घन अनवर्त दाह विनिवार, रवितैं अधिक धरो गुण सार ||17||
सदा उदित विदलित मनमोह, विघटित नेह राहु अविरोह |
तुम मुख-कमल अपूरब चंद, जगत विकाशी जोति अमंद ||18||
निश-दिन शशि रवि को नहिं काम, तुम मुख चंद हरै तम-धाम |
जो स्वभाव तैं उपजै नाज, सकल मेघ तो कौनहु काज ||19||
जो सुबोध सो है तुम माँहि, हरि हर आदिक में सो नाहिं |
हो दुति महा-रतन में होय, कांच-खंड पावै नहिं सोय ||20||
(नारच छंद)
सराग देव देख मैं भला विशेष मानिया |
स्वरूप जाहि देख वीतराग तू पिछानिया||
कछू न तोहि देखके जहाँ तुही विशेखिया |
मनोग चित्त-चोर और भूल हूँ न पेखिया ||21||
अनेक पुत्रवन्तिनी नितम्बिनी सपूत हैं |
न तो समान पुत्र और माततैं प्रसूत हैं ||
दिशा धरन्त तारिका अनेक कोटि को गिनै |
दिनेश तेजवंत एक पूर्व दिशा ही जनै ||22||
पुरान हो पुमान हो पुनीत पुण्यवान हो |
कहैं मुनीश अन्धकार-नाश को सुभान हो ||
महंत तोहि जानके न होय वश कालके |
न और मोहि मोखपन्थ देय तोहि टालके ||23||
अनंत नित्य चित्त की अगम्य रम्य आदि हो |
असंख्य सर्वव्यापि विष्णु ब्रह्म हो अनादि हो ||
महेश कामकेतु योग ईश योग ज्ञान हो |
अनेक एक ज्ञानरूप शुद्ध संतमान हो ||24||
तुही जिनेश बुद्ध है सुबुद्धि के प्रमान तैं |
तुही जिनेश शंकरो जगत्त्रये विधानतैं ||
तुही विधात है सही सुमोख-पंथ धारतैं |
नरोत्तमो तुही प्रसिद्ध अर्थ के विचारतैं ||25||
नमो करूं जिनेश तोहि आपदा निवार हो |
नमो करूं सुभूरि भूमि-लोक के सिंगार हो ||
नमो करूं भवाब्धि नीर-राशि-शोष-हेतु हो |
नमो करूं महेश तोहि मोखपंथ देतु हो||26||
(चौपाई छंद)
तुम जिन पूरन गुन-गन भरे, दोष गर्वकरि तुम परिहरे |
और देव-गण आश्रय पाय, स्वप्न न देखे तुम फिर आय ||27||
तरु अशोक-तल किरन उदार, तुम तन शोभित है अविकार |
मेघ निकट ज्यों तेज फुरंत, दिनकर दिपै तिमिर निहनंत ||28||
सिंहासन मनि-किरन-विचित्र, तापर कंचन-वरन पवित्र |
तुम तन शोभित किरन विथार, ज्यों उदयाचल रवि तम-हार ||29||
कुंद पुहुप सित चमर ढूरंत, कनक वरन तुम तन शोभन्त |
ज्यों सुमेरु तट निर्मल कान्ति, झरना झरै नीर उमगाँती ||30||
ऊंचे रहैं सूर दुति लोप, तीन छत्र तुम दिपैं अगोप |
तीन लोक की प्रभुता कहैं, मोती झालरसों छवि लहैं ||31||
दुन्दुभि-शब्द गहर गंभीर, चहुँदिशि होय तुम्हारे धीर |
त्रिभुवन-जन शिव संगम करै, मानूं जय-जय रव उच्चरै ||32||
मंद पवन गंधोदक इष्ट, विविध कल्पतरु पुहुप-सुवृष्ट |
देव करें विकसित दल सार, मानो द्विज-पंकति अवतार ||33||
तुम तन-भामंडल जिनचंद, सब दुतिवंत करत हैं मंद |
कोटि शंख रवि तेज छिपाय, शशि निर्मल निशि करै अछाय ||34||
स्वर्ग-मोख-मार्ग संकेत, परम-धरम उपदेशन हेत |
दिव्य वचन तुम खिरें अगाध, सब भाषा गर्भित हित-साध ||35||
विकसित सुवरन कमल दुति, नख-दुति मिलि चमकाहिं |
तुम पद पदवी जहँ धरो, तहँ सुर कमल रचाहिं ||36||
ऐसी महिमा तुम विषै, और धरै नहिं कोय |
सूरज में जो जोत है, नहिं तारा-गण होय ||37||
(छप्पय छंद)
मद अविल्प्त कपोल मूल अलि कुल झंकारै |
तिन सुन शब्द प्रचंड क्रोध उद्धत अति धारें ||
काल-वरन विकराल कालवत सन्मुख आवै|
ऐरावत सो प्रबल सकल जन भय उपजावै ||
देखि गयंद न भय करै तुम पद महिमा छीन |
विपति रहित सम्पति सहितवरतैं भक्त अदीन ||38||
अति मद-मत्त-गयंद कुम्भथल नखन विदारैं |
मोती रक्त समेत डारि भूतल सिंगारै ||
बाँकी दाढ़ विशाल वदन में रसना लोलै |
भीम भयानक रूप देखि जन थरहर डोलै ||
ऐसे मृगपति पगतलें जो नर आयो होय |
शरण गये तुम चरण की बाधा करै न सोय ||39||
प्रलय-पवन कर उठी आग जो तास पटंतर |
बमैं फुलिंग शिखा उतंग पर जलें निरंतर ||
जगत समस्त निगल्ल भस्म कर हैगी मानों |
तडतडात दव-अनल जोर चहूँदिशा उठानों ||
सो इक छिनमें उपशमें नाम-नीर तुम लेत |
होय सरोवर परिनमै विकसित कमल समेत ||40||
कोकिल-कंठ समान श्याम तन क्रोध जलंता |
रक्त-नयन हुंकार मार विष-कण उगलंता ||
फण को ऊँचो करे वेग ही सम्मुख धाया |
तव जन होय निशंक देख फणपति को आया ||
जो चांपै निज पगतलें व्यापै विष न लगार |
नाग-दमनि तुम नाम की है जिनके आधार ||41||
जिस रनमांही भयानक रव कर रहे तुरंगम |
घनसे गज गरजाहिं मत्त मानों गिरी जंगम ||
अति कोलाहल माहिं बात जहँ नहिं सुनीजै |
राजन को परचंड देख बल धीरज छीजै ||
नाथ तिहारे नामतें सो छिन माहिं पलाय |
ज्यों दिनकर परकाशतैं अंधकार विनाशाय ||42||
मारै जहाँ गयंद कुम्भ हथियार विदारै |
उमगै रुधिर प्रवाह वेग जलसम विस्तारे ||
होय तिरन असमर्थ महाजोधा बल पूरे |
तिस रन में जिन तोर भक्त जे हैं नर सूरे ||
दुर्जय अरि कुल जीत के जय पावैं निकलंक |
तुम पद-पंकज नम बसै ते नर सदा निशंक ||43||
नक्र चक्र मकरादि मच्छकरि भय उपजावै |
जामैं बडवा अग्नि दाहतैं नीर जलावै ||
पार न पावै जास थाह नहिं लहिये जाकी |
गरजै अति गंभीर लहरि की गिनती न ताकी ||
सुखसों तिरै समुद्रको जे तुम गुन सुमराहिं |
लोल-कलोलन के शिखर पार यान ले जाहिं ||44||
महा जलोदर रोग, भार पीड़ित नर जे हैं |
वात पित्त कफ कुष्ट आदि जो रोग गहे हैं ||
सोचत रहैं उदास नहिं जीवन की आशा |
अति घिनावनी देह धरैं दुर्गन्धि-विवासा ||
तुम पद-पंकज-धूल को जो लावैं निज अंग |
ते निरोग शरीर लहि, छिन में होय अनंग ||45||
पाँव कंठ तैं जकर बाँध सांकल अति भारी |
गाढ़ी बेड़ी पैर माहिं जिन जाँघ विदारी ||
भूख प्यास चिंता शरीर दुःख जे विललाने |
सरन नाहिं जिन कोय भूप के बंदी खाने ||
तुम सुमरत स्वयमेव ही बंधन सब खुल जाहिं |
छिन में सम्पति लहैं चिंता भय विनसाहिं ||46||
महामत्त गजराज और मृगराज दावानल |
फणपति रण परचंड नीर-निधि रोग महाबल ||
बंधन ये भय आठ डरपकर मानो नाशै |
तुम सुमरत छिनमाहिं अभय थानक परकाशै ||
इस अपार संसार में शरन नाहिं प्रभु कोय |
यातैं तुम पद-भक्त को भक्ति सहाई होय ||47||
यह गुनमाल विशाल नाथ तुम गुनन संवारी |
विविध-वर्णमय-पुहुप गूंथ मैं भक्ति विथारी ||
जे नर पहिरे कंठ भावना मनमें भावैं |
“मानतुंग” ते निजाधीन शिव-लक्ष्मी पावैं ||48||
जिन पद वन्दों मन-वच-काय, भव जल पतित उद्धरन सहाय ||1||
श्रुत पारग इन्द्रादिक देव, जाकी थुति किनी कर सेव |
शब्द मनोहर अरथ विशाल, तिस प्रभु की वरनों गुण-माल ||2||
विबुध वन्द्य पद मैं मति हीन, हो निल्ल्ज थुति मनसा कीन |
जल प्रतिबिम्ब बुद्ध को गहै, शशि-मंडल को बालक ही चहै ||3||
गुण-समुद्र तुम गुण अविकार, कहत न सुर गुरु पावैं पार |
प्रलय-पवन उद्धत जल-तन्तु, जलधि तिरै को भुज बलवन्तु ||4||
सो मैं शक्ति-हीन थुति करूं, भक्ति-भाव वश कुछ नहीं डरूं |
ज्यों मृगि निज सुत पालन हेतु, मृगपति सन्मुख जाय अचेत ||5||
मैं शठ सुधी हँसन को धाम, मुझ तव भक्ति बुलावै राम |
ज्यों पिक अम्ब कली परभाव, मधु ऋतु मधुर करै आराव ||6||
तुम जस जंपत जन छिनमाहिं, जनम-जनम के पाप नशाहिं |
ज्यों रवि उगै फटे तत्काल, अलिवत, नील निशा-तम-जाल ||7||
तव प्रभावतैं कहूं विचार, होसी यह थुति जन-मन-हार |
ज्यों जल कमल-पत्र पै परै, मुक्ताफल की दुति विस्तरै ||8||
तुम गुन-महिमा हत-दुःख-दोष, सो तो दूर रहो सुख-पोष |
पाप-विनाशक है तुम नाम, कमल-विकासी ज्यों रवि-धाम ||9||
नहिं अचम्भ जो होहिं तुरंत, तुम से तुम गुण वरणटी संत |
जो अधीन को आप समान, करै न सो निन्दित धनवान ||10||
इकटक जन तुम को अविलोय, अवर विषैं रति करे न सोय |
को करि क्षीर-जलधि जल पान, क्षार नीर न पीवै मतिमान ||11||
कहाँ तुम मुख अनुपम अविकार, सुर-नर-नाग नयन-मनहार |
कहाँ चन्द्र-मंडल सकलंक, दिन में ढ़ाक-पत्र सम रंक ||13||
पूरन चंद ज्योति छविवंत, तुम गुन तीन जगत लघंत |
एक नाथ त्रिभुवन आधार, तिन विचरत को करै निवार ||14||
जो सुर-तिय विभ्रव आरम्भ, मन न डिग्यो तुम तौ न अचंभ |
अचल चलावै प्रलय समीर, मेरु-शिखर डगमगे न धीर ||15||
धूम रहित वाती गत नेह, परकाशै त्रिभुवन-घर एह |
वात-गम्य नाहिं परचंड, अपर दीप तुम बलो अखंड ||16||
छिपहु न लुपहु राहु की छाहिं, जग परकाशक हो छिन माहिं |
घन अनवर्त दाह विनिवार, रवितैं अधिक धरो गुण सार ||17||
सदा उदित विदलित मनमोह, विघटित नेह राहु अविरोह |
तुम मुख-कमल अपूरब चंद, जगत विकाशी जोति अमंद ||18||
निश-दिन शशि रवि को नहिं काम, तुम मुख चंद हरै तम-धाम |
जो स्वभाव तैं उपजै नाज, सकल मेघ तो कौनहु काज ||19||
जो सुबोध सो है तुम माँहि, हरि हर आदिक में सो नाहिं |
हो दुति महा-रतन में होय, कांच-खंड पावै नहिं सोय ||20||
(नारच छंद)
सराग देव देख मैं भला विशेष मानिया |
स्वरूप जाहि देख वीतराग तू पिछानिया||
कछू न तोहि देखके जहाँ तुही विशेखिया |
मनोग चित्त-चोर और भूल हूँ न पेखिया ||21||
अनेक पुत्रवन्तिनी नितम्बिनी सपूत हैं |
न तो समान पुत्र और माततैं प्रसूत हैं ||
दिशा धरन्त तारिका अनेक कोटि को गिनै |
दिनेश तेजवंत एक पूर्व दिशा ही जनै ||22||
पुरान हो पुमान हो पुनीत पुण्यवान हो |
कहैं मुनीश अन्धकार-नाश को सुभान हो ||
महंत तोहि जानके न होय वश कालके |
न और मोहि मोखपन्थ देय तोहि टालके ||23||
अनंत नित्य चित्त की अगम्य रम्य आदि हो |
असंख्य सर्वव्यापि विष्णु ब्रह्म हो अनादि हो ||
महेश कामकेतु योग ईश योग ज्ञान हो |
अनेक एक ज्ञानरूप शुद्ध संतमान हो ||24||
तुही जिनेश बुद्ध है सुबुद्धि के प्रमान तैं |
तुही जिनेश शंकरो जगत्त्रये विधानतैं ||
तुही विधात है सही सुमोख-पंथ धारतैं |
नरोत्तमो तुही प्रसिद्ध अर्थ के विचारतैं ||25||
नमो करूं जिनेश तोहि आपदा निवार हो |
नमो करूं सुभूरि भूमि-लोक के सिंगार हो ||
नमो करूं भवाब्धि नीर-राशि-शोष-हेतु हो |
नमो करूं महेश तोहि मोखपंथ देतु हो||26||
(चौपाई छंद)
तुम जिन पूरन गुन-गन भरे, दोष गर्वकरि तुम परिहरे |
और देव-गण आश्रय पाय, स्वप्न न देखे तुम फिर आय ||27||
तरु अशोक-तल किरन उदार, तुम तन शोभित है अविकार |
मेघ निकट ज्यों तेज फुरंत, दिनकर दिपै तिमिर निहनंत ||28||
सिंहासन मनि-किरन-विचित्र, तापर कंचन-वरन पवित्र |
तुम तन शोभित किरन विथार, ज्यों उदयाचल रवि तम-हार ||29||
कुंद पुहुप सित चमर ढूरंत, कनक वरन तुम तन शोभन्त |
ज्यों सुमेरु तट निर्मल कान्ति, झरना झरै नीर उमगाँती ||30||
ऊंचे रहैं सूर दुति लोप, तीन छत्र तुम दिपैं अगोप |
तीन लोक की प्रभुता कहैं, मोती झालरसों छवि लहैं ||31||
दुन्दुभि-शब्द गहर गंभीर, चहुँदिशि होय तुम्हारे धीर |
त्रिभुवन-जन शिव संगम करै, मानूं जय-जय रव उच्चरै ||32||
मंद पवन गंधोदक इष्ट, विविध कल्पतरु पुहुप-सुवृष्ट |
देव करें विकसित दल सार, मानो द्विज-पंकति अवतार ||33||
तुम तन-भामंडल जिनचंद, सब दुतिवंत करत हैं मंद |
कोटि शंख रवि तेज छिपाय, शशि निर्मल निशि करै अछाय ||34||
स्वर्ग-मोख-मार्ग संकेत, परम-धरम उपदेशन हेत |
दिव्य वचन तुम खिरें अगाध, सब भाषा गर्भित हित-साध ||35||
विकसित सुवरन कमल दुति, नख-दुति मिलि चमकाहिं |
तुम पद पदवी जहँ धरो, तहँ सुर कमल रचाहिं ||36||
ऐसी महिमा तुम विषै, और धरै नहिं कोय |
सूरज में जो जोत है, नहिं तारा-गण होय ||37||
(छप्पय छंद)
मद अविल्प्त कपोल मूल अलि कुल झंकारै |
तिन सुन शब्द प्रचंड क्रोध उद्धत अति धारें ||
काल-वरन विकराल कालवत सन्मुख आवै|
ऐरावत सो प्रबल सकल जन भय उपजावै ||
देखि गयंद न भय करै तुम पद महिमा छीन |
विपति रहित सम्पति सहितवरतैं भक्त अदीन ||38||
अति मद-मत्त-गयंद कुम्भथल नखन विदारैं |
मोती रक्त समेत डारि भूतल सिंगारै ||
बाँकी दाढ़ विशाल वदन में रसना लोलै |
भीम भयानक रूप देखि जन थरहर डोलै ||
ऐसे मृगपति पगतलें जो नर आयो होय |
शरण गये तुम चरण की बाधा करै न सोय ||39||
प्रलय-पवन कर उठी आग जो तास पटंतर |
बमैं फुलिंग शिखा उतंग पर जलें निरंतर ||
जगत समस्त निगल्ल भस्म कर हैगी मानों |
तडतडात दव-अनल जोर चहूँदिशा उठानों ||
सो इक छिनमें उपशमें नाम-नीर तुम लेत |
होय सरोवर परिनमै विकसित कमल समेत ||40||
कोकिल-कंठ समान श्याम तन क्रोध जलंता |
रक्त-नयन हुंकार मार विष-कण उगलंता ||
फण को ऊँचो करे वेग ही सम्मुख धाया |
तव जन होय निशंक देख फणपति को आया ||
जो चांपै निज पगतलें व्यापै विष न लगार |
नाग-दमनि तुम नाम की है जिनके आधार ||41||
जिस रनमांही भयानक रव कर रहे तुरंगम |
घनसे गज गरजाहिं मत्त मानों गिरी जंगम ||
अति कोलाहल माहिं बात जहँ नहिं सुनीजै |
राजन को परचंड देख बल धीरज छीजै ||
नाथ तिहारे नामतें सो छिन माहिं पलाय |
ज्यों दिनकर परकाशतैं अंधकार विनाशाय ||42||
मारै जहाँ गयंद कुम्भ हथियार विदारै |
उमगै रुधिर प्रवाह वेग जलसम विस्तारे ||
होय तिरन असमर्थ महाजोधा बल पूरे |
तिस रन में जिन तोर भक्त जे हैं नर सूरे ||
दुर्जय अरि कुल जीत के जय पावैं निकलंक |
तुम पद-पंकज नम बसै ते नर सदा निशंक ||43||
नक्र चक्र मकरादि मच्छकरि भय उपजावै |
जामैं बडवा अग्नि दाहतैं नीर जलावै ||
पार न पावै जास थाह नहिं लहिये जाकी |
गरजै अति गंभीर लहरि की गिनती न ताकी ||
सुखसों तिरै समुद्रको जे तुम गुन सुमराहिं |
लोल-कलोलन के शिखर पार यान ले जाहिं ||44||
महा जलोदर रोग, भार पीड़ित नर जे हैं |
वात पित्त कफ कुष्ट आदि जो रोग गहे हैं ||
सोचत रहैं उदास नहिं जीवन की आशा |
अति घिनावनी देह धरैं दुर्गन्धि-विवासा ||
तुम पद-पंकज-धूल को जो लावैं निज अंग |
ते निरोग शरीर लहि, छिन में होय अनंग ||45||
पाँव कंठ तैं जकर बाँध सांकल अति भारी |
गाढ़ी बेड़ी पैर माहिं जिन जाँघ विदारी ||
भूख प्यास चिंता शरीर दुःख जे विललाने |
सरन नाहिं जिन कोय भूप के बंदी खाने ||
तुम सुमरत स्वयमेव ही बंधन सब खुल जाहिं |
छिन में सम्पति लहैं चिंता भय विनसाहिं ||46||
महामत्त गजराज और मृगराज दावानल |
फणपति रण परचंड नीर-निधि रोग महाबल ||
बंधन ये भय आठ डरपकर मानो नाशै |
तुम सुमरत छिनमाहिं अभय थानक परकाशै ||
इस अपार संसार में शरन नाहिं प्रभु कोय |
यातैं तुम पद-भक्त को भक्ति सहाई होय ||47||
यह गुनमाल विशाल नाथ तुम गुनन संवारी |
विविध-वर्णमय-पुहुप गूंथ मैं भक्ति विथारी ||
जे नर पहिरे कंठ भावना मनमें भावैं |
“मानतुंग” ते निजाधीन शिव-लक्ष्मी पावैं ||48||