भक्त सुरों के नत मुकुटों की, मणि-किरणों का किया विकास,
अतिशय विस्तृत पाप-तिमिर का किया जिन्होंने पूर्ण विनाश |
युगारम्भ मन भव-सागर में डूब रहे जन के आधार,
श्री-जिन के उन श्री-चरणों में वन्दन करके भली प्रकार ||1||
सकल-शास्त्र का मर्म समझ कर सुरपति हुए निपुण मतिमान,
गुण-नायक के गुण-गायक हो, किया जिन्होंने प्रभु-गुण-गान |
त्रि-जग-मनोहर थीं वे स्तुतियाँ, थीं वे उत्तम भक्ति-प्रधान,
अब मैं भी करने वाला हूँ, उन्हीं प्रथम-जिन का गुण-गान ||2||
ओ सुर-पूजित-चरण-पीठ-धर प्रभुवर! मैं हूँ बुद्धि-विहीन,
स्तुति करने चल पड़ा आपकी हूँ निर्लज्ज न तनिक प्रवीण |
जल में प्रतिबिम्ब चंदा को बालक सचमुच चंदा जान,
सहसा हाथ बढाता आगे, ना दूजा कोई मतिमान ||3||
हे गुणसागर! शशि-सम सुंदर तव शुचि गुण-गण का गुण-गान,
कोई न कर सके चाहे वह सुर-गुरु सा भी हो मतिमान |
प्रलय-पवन से जहाँ कुपित हो घड़ियालों का झुण्ड महान,
उस सागर को कैसे कोई भुज-बल से तैरे बलवान ||4||
तो भी स्वामी! वह मैं हूँ जो तव स्तुति करने को तैयार,
मुझ में कोई शक्ति नहीं पर भक्ति-भाव का है संचार |
निज-बल को जांचे बिन हिरणी निज शिशु की रक्षा के काज,
प्रबल स्नेह-वश डट जाती है आगे चाहे हो मृगराज ||5||
मंद-बुद्धि हूँ, विद्वानों का हास्य-पात्र भी हूँ मैं नाथ,
तो भी केवल भक्ति आपकी मुखर कर रही मुझे बलात |
ऋतु वसंत में कोकिल कूके मधुर-मधुर होती आवाज,
आम्र वृक्ष पर बौरों के प्रिय गुच्छों में है उसका राज ||6||
निशा-काल का अलि-सम काला जग में फैला तिमिर महान,
प्रात: ज्यों रवि किरणों द्वारा शीघ्रतया करता प्रस्थान |
जन्म श्रृंखला से जीवों ने बाँधा है भीषण पाप,
क्षण भर में तव उत्तम स्तुति से कट जाता वह अपने आप ||7||
इसीलिए मैं मंद-बुद्धि भी करूं नाथ! तव स्तुति प्रारंभ,
तव प्रभाव से चित्त हरेगी सत्पुरुषों का यह अविलंब |
हैं इसमें संदेह न कोई पत्र कमलिनी पर जिस भांति,
संगति पाकर आ जाती है जल-कण में मोती सी कान्ति ||8||
दूर रहे स्तुति प्रभो! आपकी दोष-रहित गुण की भंडार ,
तीनों जग के पापों का तव चर्चा से हो बंटाधार |
दूर रहा दिनकर, पर उसकी अति बलशाली प्रभा विशाल,
विकसित कर देती कमलों को सरोवरों में प्रात:काल ||9||
तीन भुवनों के हे भूषण! और सभी जीवों के नाथ !!
है न अधिक अचरज इसमें जो सत्य-गुणों को लेकर साथ |
तव स्तुति गाता जिनपद पाटा इसी धरा पर अपने आप,
जो न कर सके शरणागत को निज-समान उससे क्या लाभ? ||10||
अपलक दर्शन-योग्य आपके, दर्शन पा दर्शक के नैन,
हो जाते संतुष्ट पूर्णत:, अन्य कहीं पाते न चैन |
चन्द्र-किरण सा धवल मनोहर, क्षीर-सिन्धु का कर जल-पान,
खारे सागर के पानी का स्वाद कौन चाहे मतिमान? ||11||
हे त्रिभुवन के अतुल शिरोमणि! अतुल शक्ति की कान्ति-प्रधान,
जिन अणुओं ने रचा आपको, सारे जग में शोभावान |
वे अणु भी बस उतने ही थे, तनिक अधिक ना था परिमाण,
क्योंकि धरा पर, रूप दूसरा, है न कहीं भी आप समान ||12||
सुर-नर-नाग-कुमारों की भी आखों को भी तव मुख से प्रीत,
जिसने जग की सारी सुंदर-सुंदर उपमाएं ली हैं जीत |
और कहाँ चंदा बेचारा जो नित धारण करे कलंक ?
दिन में ढाक-पत्र सा निष्प्रभ, होकर लगता पूरा रंक ||13||
पूर्ण-चन्द्र के कला-वृन्द सम धवल आपके गुण सब और,
व्याप्त हो रहे हैं इस जग में उनके यश का कहीं न छोर |
ठीक बात है जो त्रि-भुवन के स्वामी के स्वामी के दास,
मुक्त विचरते उन्हें रोकने कौन साहसी आता पास? ||14||
यदि सुरांगनाएँ तव मन में नहीं ला सकीं तनिक विकार,
तो इसमें अचरज कैसा? प्रभु! स्वयं उन्हीं ने मानी हार |
गिरी को कम्पित करने वाला प्रलयकाल का झंझावात,
कभी डिगा पाया क्या अब तक मेरु-शखर को जग-विख्यात? ||15||
प्रभो! आपमें धुंआ न बत्ती और तेल का भी न पूर,
तो भी इस सारे त्रि-भुवन को आभा से करते भरपूर |
बुझा न सकती विकट हवाएं जिनसे गिरी भी जाते काँप,
अंत: जिनेश्वर! जगत-प्रकाशक अद्वितीय दीपक हैं आप ||16||
अस्त आपका कभी न होता राहु बना सकता न ग्रास,
एक साथ सहसा त्रि-भुवन में बिखरा देते आप प्रकाश |
छिपे न बादल के भीतर भी हे मुनीन्द्र! तव महाप्रताप,
अंत: जगत में रवि से बढ़ कर महिमा के धारी हैं आप ||17||
रहता है जो उदित हमेशा मोह-तिमिर को करता नष्ट,
जो न राहु के मुख में जाता, बादल देते जिसे न कष्ट |
तेजस्वी-मुख-कमल आपका एक अनोखे चन्द्र समान,
करता हुआ प्रकाशित जग को शोभा पाता प्रभो! महान ||18||
विभो! आपके मुख शशि से जब, अन्धकार का रहा न नाम,
दिन में दिनकर, निशि में शशि का, फिर इस जग में है क्या काम? ||
शालि-धान्य की पकी फसल से, शोभित धरती पर अभिराम,
जल-पूरित भारी मेघों का, रह जाता फिर कितना काम ||19||
ज्यों तुममें प्रभु शोभा पाता,! जगत-प्रकाशक केवलज्ञान,
त्यों हरि-हर-आदिक प्रभुओं में, होता ज्ञान न आप समान |
ज्यों झिलमिल मणियों में पाता तेज स्वयं ही सहज निखार,
कांच-खंड में आ न सके वह हो रवि-किरणों का संचार ||20||
हरि-हरादि को ही मैं सचमुच, उत्तम समझ रहा जिनराज !
जिन्हें देख कर हृदय आपमें, आनन्दित होता है आज |
नाथ! आपके दर्शन से क्या? जिसको पा लेने के बाद,
अगले भव में भी ना कोई मन भाता ना आता याद ||21||
जनती हैं शत-शत माताएँ शत-शत बार पुत्र गुणवान,
पर तुम जैसे सुत की माता हुई न जग में अन्य महान |
सर्व दिशाएँ धरे सर्वदा ग्रह-तारा-नक्षत्र अनेक,
पर प्रकाश के पुंज सूर्य को पूर्व दिशा ही जनती एक ||22||
सभी मुनीश्वर यही मानते, परम-पुरुष हैं आप महान,
और तिमिर के सन्मुख स्वामी! हैं उज्ज्वल आदित्य-समान |
एक आपको सम्यक पाकर मृत्युंजय बनते वे संत,
नहीं दूसरा है कोई भी मोक्षपुरी का मंगल पन्थ ||23||
अव्यय, विभु, अचिन्त्य, संख्या से परे, आद्य-अरहंत महान,
जग ब्रम्हा, ईश्वर, अनंत-गुण, मदन-विनाशक अग्नि-समान |
योगीश्वर, विख्यात-ध्यानधर, जिन! अनेक हो कर भी एक,
ज्ञान-स्वरूपी और अमल भी तुम्हें संत-जन कहते नेक ||24||
तुम्हीं बुद्ध हो क्योंकि सुरों से, पूजित है तव केवलज्ञान,
तुम्हीं महेश्वर शंकर जग हो, करते हो आनन्द प्रदान |
तुम्हीं धीर! हो ब्रम्हा आतम-हित की विधि का किया विधान,
तुम्हीं प्रकट पुरषोत्तम भी हो हे भगवान! अतिशय गुणवान ||25||
दुःखहर्ता हे नाथ! त्रि-जग के, नमन आपको करूं सदैव,
वसुंधरा के उज्ज्वल भूषण, नमन आपको करूं सदैव |
तीनों भुवनों के परमेश्वर, नमन आपको करूं सदैव,
भव-सागर के शोषक हे जिन! नमन आपको करूं सदैव ||26||
इसमें क्या आश्चर्य मुनीश्वर! मिला न जब कोई आवास,
तब पाकर तव शरण सभी गुण, बने आपके सच्चे दास |
अपने- अपने विविध घरों में रहने का थे जिन्हें घमंड,
कभी स्वप्न में भी तव दर्शन कर न सके वे दोष प्रचंड ||27||
ऊंचे तरु अशोक के नीचे नाथ विराजे आभावान,
रूप आपका सबको भाता निर्विकार शोभा की खान |
ज्यों बादल के निकट सुहाता बिम्ब सूर्य का तेजोधाम,
प्रकट बिखरती किरणों वाला विस्तृत-तन-नाशक अभिराम ||28||
मणि-किरणों से रंग-बिरंगे सिंहासन पर निःसंदेह,
अपनी दिव्य छटा बिखराती तव कंचन-सम पीली देह |
नभ में फैल रहा है जिसकी किरण-लताओं का विस्तार,
ऐसा रवि ही मानो प्रात: उदयाचल पर हो अविकार ||29||
कुंद-सुमन-सम धवल सुचंचल चौंसठ चँवरों से अभिराम,
कंचन जैसा तव सुंदर तन भुर सुहाता है गुणधाम |
चंदा-सम उज्ज्वल झरनों की बहती धाराओं से युक्त,
मानों सुर-गिरि का कंचनमय ऊँचा तट हो दूषण-मुक्त ||30||
दिव्य मोतियों के गुच्छों की रचना से अति शोभावान,
रवि-किरणों का घाम रोकता लगता शशि जैसा मनभान |
आप तीन जगत जे प्रभुवर हैं, ऐसा जो करता विख्यात,
छत्र-त्रय-तक ऊपर रहकर शोभित होता है दिन-रात ||31||
गूँज उठा है दिशा-भाग पा जिसकी ऊंची ध्वनि गम्भीर,
जग में सबको हो सतसंगम इसमें जो पटु और अधीर |
कालजयी का जय-घोषक बन नभ में बजता दुन्दुभि-वाद्य,
यशोगान नित करे आपका जय-जय-जय तीर्थंकर आद्य ||32||
पारिजात, मन्दार, नमेरु, सन्तानक हैं सुंदर फूल,
जिनकी वर्षा नभ से होती, उत्तम, दिव्य तथा अनुकूल |
सुरभित जल-कण, पवन सहित शुभ, होता जिसका मंद प्रपात,
मानों तव वचनाली बरसे, सुमनाली बन कर जिन-नाथ! ||33||
विभो! आपके जगमग-जगमग भामंडल की प्रभा विशाल,
त्रि-भुवन में सबकी आभा को लज्जित करती त्रिकाल |
उज्ज्वलता मन अंतराल बिन अगणित उगते सूर्य-समान,
तो भी शशि-सम शीतल होती, हरे निशा का नाम-निशान ||34||
स्वर्ग-लोक या मोक्ष-धाम के पथ के खोजी को जो इष्ट,
सच्चा धर्म-स्वरूप जगत को बतलाने में परम विशिष्ट |
प्रगट अर्थ-युत सब भाषामय परिवर्तन का लिये स्वभाव,
दिव्य आपकी वाणी खिरती समवशरण में महाप्रभाव ||35||
खिले हुए नव स्वर्ण-कमल-दल जैसी सुखद कांति के धाम,
नख से चारों और बिखरती किरण-शिखाओं से अभिराम |
ऐसे चरण जहाँ पड़ते तव, वहां कमल दो सौ पच्चीस,
स्वयं देव रचते जाते हैं और झुकाते अपना शीश ||36||
धर्म-देशना में तव वैभव इस प्रकार ज्यों हुआ अपार,
अन्य किसी के वैभव ने त्यों नहीं कहीं पाया विस्तार |
होती जैसी प्रखर प्रभा प्रभु! रवि की करती तम का नाश,
जगमग-जगमग करने पर भी कहाँ ग्रहों में वही प्रकाश? ||37||
मद झरने से मटमैले हैं हिलते-डुलते जिसके गाल,
फिर मंडराते भौरों का स्वर सुन के भड़का जो विकराल |
ऐरावत सम ऊँचा पूरा आगे को बढ़ता गजराज,
नहीं डरा पाता उनको जो तव शरणागत हैं जिनराज! ||38||
लहु से लथपथ गिरते उज्ज्वल गज-मुक्ता गज मस्तक फाड़,
बिखरा दिये धरा पर जिसने अहो! लगा कर एक दहाड़ |
ऐसा सिंह न करता हमला होकर हमले हो तैयार,
उस चपेट में न आये नर पर, जिसे आपके पग आधार ||39||
प्रलय-काल की अग्नि सरीखी ज्वालाओं वाली विकराल,
उचट रही जो चिंगारी बन, काल सरीखी जिसकी चाल |
सबके भक्षण की इच्छुक सी आगे बढती वन की आग,
मात्र आपके नाम-नीर से वह पूरी बुझती नीराग ||40||
कोकिल-कंठ सरीखा काला लाल-नेत्र वाला विकराल,
फण उठा कर गुस्से में जो चलता टेढ़ी-मेढ़ी चाल |
आगे बढ़ते उस विषधर को वह करता पैरों से पार,
अहो! बेधडक जिसके हिय, तव नाम-नाग-दमनी विषहार ||41||
जहाँ हिनहिनाहट घोड़ों की जहाँ रहे हाथी चिंघाड़,
मची हुई है भीषण ध्वनि जो कानों को दे सकती फाड़ |
वह सशक्त रिपु-नृप की सेना तव गुण-कीर्तन से तत्काल,
विघटित होती जैसे रवि से विघटित होता तम विकराल ||42||
भालों से हटी गजराजों के लहु की सरिता में अविलंब,
भीतर-बाहर होने वाले योद्धा ला देते हैं कम्प |
उस रण में तव पद-पंकज का होता है जिनको आधार,
विजय-पताका फहराते वे, दुर्जय-रिपु का कर संहार ||43||
जहाँ भयानक घड़ियालों का झुण्ड कुपित है, जहाँ विशाल,
है पाठीन-मीन, भीतर फिर, भीषण बडवानल विकराल |
ऐसे तूफानी सागर में लहरों पर जिनके जल-यान,
तव सुमिरन से भय तज कर वे, पाते अपना वांछित स्थान ||44||
हुआ जलोदर रोग भयंकर कमर झुकी दुःख बढ़ा अपार,
दशा बनी दयनीय न आशा जीने की भी दिन दो-चार |
वे नर भी तव पद-पंकज की, धूलि-सुधा का पाकर योग,
हो जाते हैं कामदेव से रूपवान पूरे निरोग ||45||
जकड़े हैं पूरे के पूरे, भारी सांकल से जो लोग,
बेड़ी से छिल गई पिंडलियाँ, भीषण कष्ट रहे जो भोग |
सतत आपके नाम-मंत्र का, सुमिरन करके वे तत्काल,
स्वयं छूट जाते बंधन से, नाहो पाटा बांका बाल ||46||
पागल हाथी, सिंह, दावानल, नाग, युद्ध, सागर विकराल,
रोग जलोदर या बंधन से उस भक्त पुरुष का जो मतिमान,
करता है इस स्तोत्र-पथ से, हे प्रभुवर! तव शुचि-गुण-गान ||47||
सूत्र बना गुण-वृन्द आपका, अक्षर रंग-बिरंगे फूल,
स्तुति माला तैयार हुई यह भक्ति आपकी जिसका मूल |
मानतुंग जो मनुज इसे नित कंठ धरे उसको हे देव,
वरे नियम से जग में अतुलित मुक्ति रूप लक्ष्मी स्वयमेव ||48||
अतिशय विस्तृत पाप-तिमिर का किया जिन्होंने पूर्ण विनाश |
युगारम्भ मन भव-सागर में डूब रहे जन के आधार,
श्री-जिन के उन श्री-चरणों में वन्दन करके भली प्रकार ||1||
सकल-शास्त्र का मर्म समझ कर सुरपति हुए निपुण मतिमान,
गुण-नायक के गुण-गायक हो, किया जिन्होंने प्रभु-गुण-गान |
त्रि-जग-मनोहर थीं वे स्तुतियाँ, थीं वे उत्तम भक्ति-प्रधान,
अब मैं भी करने वाला हूँ, उन्हीं प्रथम-जिन का गुण-गान ||2||
ओ सुर-पूजित-चरण-पीठ-धर प्रभुवर! मैं हूँ बुद्धि-विहीन,
स्तुति करने चल पड़ा आपकी हूँ निर्लज्ज न तनिक प्रवीण |
जल में प्रतिबिम्ब चंदा को बालक सचमुच चंदा जान,
सहसा हाथ बढाता आगे, ना दूजा कोई मतिमान ||3||
हे गुणसागर! शशि-सम सुंदर तव शुचि गुण-गण का गुण-गान,
कोई न कर सके चाहे वह सुर-गुरु सा भी हो मतिमान |
प्रलय-पवन से जहाँ कुपित हो घड़ियालों का झुण्ड महान,
उस सागर को कैसे कोई भुज-बल से तैरे बलवान ||4||
तो भी स्वामी! वह मैं हूँ जो तव स्तुति करने को तैयार,
मुझ में कोई शक्ति नहीं पर भक्ति-भाव का है संचार |
निज-बल को जांचे बिन हिरणी निज शिशु की रक्षा के काज,
प्रबल स्नेह-वश डट जाती है आगे चाहे हो मृगराज ||5||
मंद-बुद्धि हूँ, विद्वानों का हास्य-पात्र भी हूँ मैं नाथ,
तो भी केवल भक्ति आपकी मुखर कर रही मुझे बलात |
ऋतु वसंत में कोकिल कूके मधुर-मधुर होती आवाज,
आम्र वृक्ष पर बौरों के प्रिय गुच्छों में है उसका राज ||6||
निशा-काल का अलि-सम काला जग में फैला तिमिर महान,
प्रात: ज्यों रवि किरणों द्वारा शीघ्रतया करता प्रस्थान |
जन्म श्रृंखला से जीवों ने बाँधा है भीषण पाप,
क्षण भर में तव उत्तम स्तुति से कट जाता वह अपने आप ||7||
इसीलिए मैं मंद-बुद्धि भी करूं नाथ! तव स्तुति प्रारंभ,
तव प्रभाव से चित्त हरेगी सत्पुरुषों का यह अविलंब |
हैं इसमें संदेह न कोई पत्र कमलिनी पर जिस भांति,
संगति पाकर आ जाती है जल-कण में मोती सी कान्ति ||8||
दूर रहे स्तुति प्रभो! आपकी दोष-रहित गुण की भंडार ,
तीनों जग के पापों का तव चर्चा से हो बंटाधार |
दूर रहा दिनकर, पर उसकी अति बलशाली प्रभा विशाल,
विकसित कर देती कमलों को सरोवरों में प्रात:काल ||9||
तीन भुवनों के हे भूषण! और सभी जीवों के नाथ !!
है न अधिक अचरज इसमें जो सत्य-गुणों को लेकर साथ |
तव स्तुति गाता जिनपद पाटा इसी धरा पर अपने आप,
जो न कर सके शरणागत को निज-समान उससे क्या लाभ? ||10||
अपलक दर्शन-योग्य आपके, दर्शन पा दर्शक के नैन,
हो जाते संतुष्ट पूर्णत:, अन्य कहीं पाते न चैन |
चन्द्र-किरण सा धवल मनोहर, क्षीर-सिन्धु का कर जल-पान,
खारे सागर के पानी का स्वाद कौन चाहे मतिमान? ||11||
हे त्रिभुवन के अतुल शिरोमणि! अतुल शक्ति की कान्ति-प्रधान,
जिन अणुओं ने रचा आपको, सारे जग में शोभावान |
वे अणु भी बस उतने ही थे, तनिक अधिक ना था परिमाण,
क्योंकि धरा पर, रूप दूसरा, है न कहीं भी आप समान ||12||
सुर-नर-नाग-कुमारों की भी आखों को भी तव मुख से प्रीत,
जिसने जग की सारी सुंदर-सुंदर उपमाएं ली हैं जीत |
और कहाँ चंदा बेचारा जो नित धारण करे कलंक ?
दिन में ढाक-पत्र सा निष्प्रभ, होकर लगता पूरा रंक ||13||
पूर्ण-चन्द्र के कला-वृन्द सम धवल आपके गुण सब और,
व्याप्त हो रहे हैं इस जग में उनके यश का कहीं न छोर |
ठीक बात है जो त्रि-भुवन के स्वामी के स्वामी के दास,
मुक्त विचरते उन्हें रोकने कौन साहसी आता पास? ||14||
यदि सुरांगनाएँ तव मन में नहीं ला सकीं तनिक विकार,
तो इसमें अचरज कैसा? प्रभु! स्वयं उन्हीं ने मानी हार |
गिरी को कम्पित करने वाला प्रलयकाल का झंझावात,
कभी डिगा पाया क्या अब तक मेरु-शखर को जग-विख्यात? ||15||
प्रभो! आपमें धुंआ न बत्ती और तेल का भी न पूर,
तो भी इस सारे त्रि-भुवन को आभा से करते भरपूर |
बुझा न सकती विकट हवाएं जिनसे गिरी भी जाते काँप,
अंत: जिनेश्वर! जगत-प्रकाशक अद्वितीय दीपक हैं आप ||16||
अस्त आपका कभी न होता राहु बना सकता न ग्रास,
एक साथ सहसा त्रि-भुवन में बिखरा देते आप प्रकाश |
छिपे न बादल के भीतर भी हे मुनीन्द्र! तव महाप्रताप,
अंत: जगत में रवि से बढ़ कर महिमा के धारी हैं आप ||17||
रहता है जो उदित हमेशा मोह-तिमिर को करता नष्ट,
जो न राहु के मुख में जाता, बादल देते जिसे न कष्ट |
तेजस्वी-मुख-कमल आपका एक अनोखे चन्द्र समान,
करता हुआ प्रकाशित जग को शोभा पाता प्रभो! महान ||18||
विभो! आपके मुख शशि से जब, अन्धकार का रहा न नाम,
दिन में दिनकर, निशि में शशि का, फिर इस जग में है क्या काम? ||
शालि-धान्य की पकी फसल से, शोभित धरती पर अभिराम,
जल-पूरित भारी मेघों का, रह जाता फिर कितना काम ||19||
ज्यों तुममें प्रभु शोभा पाता,! जगत-प्रकाशक केवलज्ञान,
त्यों हरि-हर-आदिक प्रभुओं में, होता ज्ञान न आप समान |
ज्यों झिलमिल मणियों में पाता तेज स्वयं ही सहज निखार,
कांच-खंड में आ न सके वह हो रवि-किरणों का संचार ||20||
हरि-हरादि को ही मैं सचमुच, उत्तम समझ रहा जिनराज !
जिन्हें देख कर हृदय आपमें, आनन्दित होता है आज |
नाथ! आपके दर्शन से क्या? जिसको पा लेने के बाद,
अगले भव में भी ना कोई मन भाता ना आता याद ||21||
जनती हैं शत-शत माताएँ शत-शत बार पुत्र गुणवान,
पर तुम जैसे सुत की माता हुई न जग में अन्य महान |
सर्व दिशाएँ धरे सर्वदा ग्रह-तारा-नक्षत्र अनेक,
पर प्रकाश के पुंज सूर्य को पूर्व दिशा ही जनती एक ||22||
सभी मुनीश्वर यही मानते, परम-पुरुष हैं आप महान,
और तिमिर के सन्मुख स्वामी! हैं उज्ज्वल आदित्य-समान |
एक आपको सम्यक पाकर मृत्युंजय बनते वे संत,
नहीं दूसरा है कोई भी मोक्षपुरी का मंगल पन्थ ||23||
अव्यय, विभु, अचिन्त्य, संख्या से परे, आद्य-अरहंत महान,
जग ब्रम्हा, ईश्वर, अनंत-गुण, मदन-विनाशक अग्नि-समान |
योगीश्वर, विख्यात-ध्यानधर, जिन! अनेक हो कर भी एक,
ज्ञान-स्वरूपी और अमल भी तुम्हें संत-जन कहते नेक ||24||
तुम्हीं बुद्ध हो क्योंकि सुरों से, पूजित है तव केवलज्ञान,
तुम्हीं महेश्वर शंकर जग हो, करते हो आनन्द प्रदान |
तुम्हीं धीर! हो ब्रम्हा आतम-हित की विधि का किया विधान,
तुम्हीं प्रकट पुरषोत्तम भी हो हे भगवान! अतिशय गुणवान ||25||
दुःखहर्ता हे नाथ! त्रि-जग के, नमन आपको करूं सदैव,
वसुंधरा के उज्ज्वल भूषण, नमन आपको करूं सदैव |
तीनों भुवनों के परमेश्वर, नमन आपको करूं सदैव,
भव-सागर के शोषक हे जिन! नमन आपको करूं सदैव ||26||
इसमें क्या आश्चर्य मुनीश्वर! मिला न जब कोई आवास,
तब पाकर तव शरण सभी गुण, बने आपके सच्चे दास |
अपने- अपने विविध घरों में रहने का थे जिन्हें घमंड,
कभी स्वप्न में भी तव दर्शन कर न सके वे दोष प्रचंड ||27||
ऊंचे तरु अशोक के नीचे नाथ विराजे आभावान,
रूप आपका सबको भाता निर्विकार शोभा की खान |
ज्यों बादल के निकट सुहाता बिम्ब सूर्य का तेजोधाम,
प्रकट बिखरती किरणों वाला विस्तृत-तन-नाशक अभिराम ||28||
मणि-किरणों से रंग-बिरंगे सिंहासन पर निःसंदेह,
अपनी दिव्य छटा बिखराती तव कंचन-सम पीली देह |
नभ में फैल रहा है जिसकी किरण-लताओं का विस्तार,
ऐसा रवि ही मानो प्रात: उदयाचल पर हो अविकार ||29||
कुंद-सुमन-सम धवल सुचंचल चौंसठ चँवरों से अभिराम,
कंचन जैसा तव सुंदर तन भुर सुहाता है गुणधाम |
चंदा-सम उज्ज्वल झरनों की बहती धाराओं से युक्त,
मानों सुर-गिरि का कंचनमय ऊँचा तट हो दूषण-मुक्त ||30||
दिव्य मोतियों के गुच्छों की रचना से अति शोभावान,
रवि-किरणों का घाम रोकता लगता शशि जैसा मनभान |
आप तीन जगत जे प्रभुवर हैं, ऐसा जो करता विख्यात,
छत्र-त्रय-तक ऊपर रहकर शोभित होता है दिन-रात ||31||
गूँज उठा है दिशा-भाग पा जिसकी ऊंची ध्वनि गम्भीर,
जग में सबको हो सतसंगम इसमें जो पटु और अधीर |
कालजयी का जय-घोषक बन नभ में बजता दुन्दुभि-वाद्य,
यशोगान नित करे आपका जय-जय-जय तीर्थंकर आद्य ||32||
पारिजात, मन्दार, नमेरु, सन्तानक हैं सुंदर फूल,
जिनकी वर्षा नभ से होती, उत्तम, दिव्य तथा अनुकूल |
सुरभित जल-कण, पवन सहित शुभ, होता जिसका मंद प्रपात,
मानों तव वचनाली बरसे, सुमनाली बन कर जिन-नाथ! ||33||
विभो! आपके जगमग-जगमग भामंडल की प्रभा विशाल,
त्रि-भुवन में सबकी आभा को लज्जित करती त्रिकाल |
उज्ज्वलता मन अंतराल बिन अगणित उगते सूर्य-समान,
तो भी शशि-सम शीतल होती, हरे निशा का नाम-निशान ||34||
स्वर्ग-लोक या मोक्ष-धाम के पथ के खोजी को जो इष्ट,
सच्चा धर्म-स्वरूप जगत को बतलाने में परम विशिष्ट |
प्रगट अर्थ-युत सब भाषामय परिवर्तन का लिये स्वभाव,
दिव्य आपकी वाणी खिरती समवशरण में महाप्रभाव ||35||
खिले हुए नव स्वर्ण-कमल-दल जैसी सुखद कांति के धाम,
नख से चारों और बिखरती किरण-शिखाओं से अभिराम |
ऐसे चरण जहाँ पड़ते तव, वहां कमल दो सौ पच्चीस,
स्वयं देव रचते जाते हैं और झुकाते अपना शीश ||36||
धर्म-देशना में तव वैभव इस प्रकार ज्यों हुआ अपार,
अन्य किसी के वैभव ने त्यों नहीं कहीं पाया विस्तार |
होती जैसी प्रखर प्रभा प्रभु! रवि की करती तम का नाश,
जगमग-जगमग करने पर भी कहाँ ग्रहों में वही प्रकाश? ||37||
मद झरने से मटमैले हैं हिलते-डुलते जिसके गाल,
फिर मंडराते भौरों का स्वर सुन के भड़का जो विकराल |
ऐरावत सम ऊँचा पूरा आगे को बढ़ता गजराज,
नहीं डरा पाता उनको जो तव शरणागत हैं जिनराज! ||38||
लहु से लथपथ गिरते उज्ज्वल गज-मुक्ता गज मस्तक फाड़,
बिखरा दिये धरा पर जिसने अहो! लगा कर एक दहाड़ |
ऐसा सिंह न करता हमला होकर हमले हो तैयार,
उस चपेट में न आये नर पर, जिसे आपके पग आधार ||39||
प्रलय-काल की अग्नि सरीखी ज्वालाओं वाली विकराल,
उचट रही जो चिंगारी बन, काल सरीखी जिसकी चाल |
सबके भक्षण की इच्छुक सी आगे बढती वन की आग,
मात्र आपके नाम-नीर से वह पूरी बुझती नीराग ||40||
कोकिल-कंठ सरीखा काला लाल-नेत्र वाला विकराल,
फण उठा कर गुस्से में जो चलता टेढ़ी-मेढ़ी चाल |
आगे बढ़ते उस विषधर को वह करता पैरों से पार,
अहो! बेधडक जिसके हिय, तव नाम-नाग-दमनी विषहार ||41||
जहाँ हिनहिनाहट घोड़ों की जहाँ रहे हाथी चिंघाड़,
मची हुई है भीषण ध्वनि जो कानों को दे सकती फाड़ |
वह सशक्त रिपु-नृप की सेना तव गुण-कीर्तन से तत्काल,
विघटित होती जैसे रवि से विघटित होता तम विकराल ||42||
भालों से हटी गजराजों के लहु की सरिता में अविलंब,
भीतर-बाहर होने वाले योद्धा ला देते हैं कम्प |
उस रण में तव पद-पंकज का होता है जिनको आधार,
विजय-पताका फहराते वे, दुर्जय-रिपु का कर संहार ||43||
जहाँ भयानक घड़ियालों का झुण्ड कुपित है, जहाँ विशाल,
है पाठीन-मीन, भीतर फिर, भीषण बडवानल विकराल |
ऐसे तूफानी सागर में लहरों पर जिनके जल-यान,
तव सुमिरन से भय तज कर वे, पाते अपना वांछित स्थान ||44||
हुआ जलोदर रोग भयंकर कमर झुकी दुःख बढ़ा अपार,
दशा बनी दयनीय न आशा जीने की भी दिन दो-चार |
वे नर भी तव पद-पंकज की, धूलि-सुधा का पाकर योग,
हो जाते हैं कामदेव से रूपवान पूरे निरोग ||45||
जकड़े हैं पूरे के पूरे, भारी सांकल से जो लोग,
बेड़ी से छिल गई पिंडलियाँ, भीषण कष्ट रहे जो भोग |
सतत आपके नाम-मंत्र का, सुमिरन करके वे तत्काल,
स्वयं छूट जाते बंधन से, नाहो पाटा बांका बाल ||46||
पागल हाथी, सिंह, दावानल, नाग, युद्ध, सागर विकराल,
रोग जलोदर या बंधन से उस भक्त पुरुष का जो मतिमान,
करता है इस स्तोत्र-पथ से, हे प्रभुवर! तव शुचि-गुण-गान ||47||
सूत्र बना गुण-वृन्द आपका, अक्षर रंग-बिरंगे फूल,
स्तुति माला तैयार हुई यह भक्ति आपकी जिसका मूल |
मानतुंग जो मनुज इसे नित कंठ धरे उसको हे देव,
वरे नियम से जग में अतुलित मुक्ति रूप लक्ष्मी स्वयमेव ||48||