जल फल आठों द्रव्य, अरघ कर प्रीति धरी है |
गणधर इंद्रनहु तुव, थुति पूरी न करी है ||
द्यानत सेवक जानके, जग ते लेहु निकार |
सीमंधर जिन आदि दे, बीस विदेह मंझार ||
श्री जिनराज हो, भव तारण तरण जहाज ||
ॐ ह्रीं श्रीविद्यमान विंशति तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||