(दोहा)
उत्तम क्षमा आत्मा का गुण उत्तम मार्दव विनय स्वरूप |
उत्तम आर्जव माया नाशक उत्तम शौच लोभहर भूप ||
उत्तम सत्य स्वभाव ज्ञानमय उत्तम संयम संवर रूप |
उत्तम तप निर्जरा कर्म की उत्तम त्याग स्वरूप अनूप ||
उत्तम आकिंचन विरागमय उत्तम ब्रह्मचर्य चिद्रूप |
धन्य-धन्य दशधर्म परमपद दाता सुखमय मोक्षस्वरूप ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
जलस्वभाव शीतल निर्मल पीकर भी प्यास न बुझ पाई |
जन्म-मरण का चक्र मिटाने आज धर्म की सुधि आई ||
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग |
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म के दशलक्षण से हो अनुराग ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचनब्रह्मचर्येति दशलक्षणधर्माय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
दाह निकंदन चन्दन पाकर भी तो दाह न मिट पाई |
राग आग की ज्वाल बुझाने आज धर्म की सुधि आई ||
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग |
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म के दशलक्षण से हो अनुराग ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
शुभ्र अखंडित तंदुल पाकर भी निजरूचि न सुहा पाई |
अजर अमर अक्षय पद पाने आज धर्म की सुधि आई ||
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग |
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म के दशलक्षण से हो अनुराग ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
अगणित पुष्प सुवासित पाकर काम व्याधि न मिट पाई |
अब कन्दर्प दर्प हरने को आज धर्म की सुधि आई ||
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग |
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म के दशलक्षण से हो अनुराग ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
जड़ की रूचि के कारण अब तक निज की तृप्ति न हो पाई |
सहज तृप्त चेतन पद पाने आज धर्म की सुधि आई ||
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग |
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म के दशलक्षण से हो अनुराग ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
मिथ्या भ्रम की चकाचौंध में दृष्टि शुद्ध न हो पाई |
मोह तिमिर का अंत कराने आज धर्म की सुधि आई ||
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग |
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म के दशलक्षण से हो अनुराग ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
आर्त-रौद्र ध्यानों में रहकर धर्म ध्यान छवि न भाई |
अष्टकर्म विध्वंस कराने आज धर्म की सुधि आई ||
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग |
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म के दशलक्षण से हो अनुराग ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
राग द्वेष परिणति फल पाकर निज परिणति ना मिल पाई |
फल निर्वाण प्राप्त करने को आज धर्म की सुधि आई ||
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग |
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म के दशलक्षण से हो अनुराग ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
चौरासी के क्रूर चक्र में उलझा शांति न मिल पाई |
निज अमरत्व प्राप्त करने को आज धर्म की सुधि आई ||
उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग |
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म के दशलक्षण से हो अनुराग ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्घ्यावलि
उत्तम क्षमा धर्म है सुख का सागर तीन लोक में सार |
जन्म मरण दुख का अभाव कर शीघ्र नाश करता संसार ||
क्रोध कषाय विनाशक दुर्गति नाशक मुनियों द्वारा पूज्य |
व्रत संयम को सफल बनाता सुगति प्रदाता है अतिपूज्य ||
जहाँ क्षमा है वहीं धर्म है स्वपर दया का मूल महान |
जय जय उत्तम क्षमा धर्म की जो है जग में श्रेष्ठ प्रधान ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमाधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम मार्दव धर्म ज्ञानमय वसु मद रहित परम सुखकार |
मान कषाय नष्ट करता है विनय गुणों का है भंडार ||
विनय बिना तत्वों का हो सकता न कभी सम्यक श्रद्धान |
दर्शन ज्ञान चरित्र विनय तप बिना न होता सम्यकज्ञान ||
जहाँ मार्दव वहीं धर्म है वहीं मोक्ष नगरी का द्वार |
उत्तम मार्दव धर्म हमारा विनय भाव की जय जयकार ||
ॐ ह्रीं उत्तममार्दवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम आर्जव धर्म कुटिलता से विरहित ऋजुता से पूर्ण |
निज आतम का परम मित्र है करता माया शल्य विचूर्ण ||
लेशमात्र भी मायाचारी कुगति प्रदायक अति दुखकार |
सरल भाव चेतन गुण धारी टंकोत्कीर्ण महा सुखकार ||
शिवमय शाश्वत मोक्ष प्रदाता मंगलमय अनमोल परम |
उत्तम आर्जव धर्म आत्म का अभय रूप निश्चल अनुपम ||
ॐ ह्रीं उत्तमार्जवधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम शौच धर्म सुखकारी मन वच काया करता शुद्ध |
लोभ कषाय नाश क्र देता समकित होता परम विशुद्ध ||
ऋद्धि सिद्धि का लोभ न किंचित इसके कारण हो पाता |
जो संतोषामृत पीता है वही आतमा को ध्याता ||
शौच धर्म पावन मंगलमय से हो जाता है निर्वाण |
उत्तम शौच धर्म ही जग में करता है सबका कल्याण ||
ॐ ह्रीं उत्तमशौचधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम सत्य धर्म हितकारी निज स्वभाव शीतल पावन |
वचन गुप्ति के धारी मुनिवर ही पाते हैं मुक्ति सदन ||
सब धर्मों का यह प्रधान है भव तम नाशक सूर्य समान |
सुगति प्रदायक भव सागर से पार उतरने को जलयान ||
सत्य धर्म से अणुव्रत और महाव्रत होते हैं निर्दोष |
जय जय उत्तम सत्य धर्म त्रिभुवन में गूँज रहा जय घोष ||
ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम संयम तीन लोक में दुर्लभ, सहज मनुज गति में |
दो क्षण पाने की क्षमता, देवों में न सुरपति में ||
पंचेन्द्रिय मन वश में करना, त्रस-थावर रक्षा करना |
अनुकम्पा आस्तिक्य प्रशम संवेग धार मुनिपद धरना ||
धन्य-धन्य संयम की महिमा तीर्थंकर तक अपनाते |
उत्तम संयम धर्म जयति जय हम पूजन कर हर्षाते ||
ॐ ह्रीं उत्तमसंयमधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम तप है धर्म परम पावन स्वरूप का मनन जहाँ |
यही सुतप है अष्ट कर्म की होती है निर्जरा जहाँ ||
पंचेन्द्रिय का दमन सर्व इच्छाओं का निरोध करना |
सम्यकतप धर निज स्वभाव से भाव शुभाशुभ को हरना ||
धन्य धन्य बाह्यांतर द्वादश तप विध धन्य धन्य मुनिराज |
उत्तम तप जो धारण करते हो जाते हैं श्री जिनराज ||
ॐ ह्रीं उत्तमतपधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम त्याग धर्म अनुपम पर पदार्थ का निश्चय त्याग |
अभय शास्त्र औषधि आहार हैं चारों दान सरल शुभ राग ||
सरल भाव से प्रेम पूर्वक करते हैं जो चारों दान |
एक दिवस गृह त्याग साधु हो करते हैं निज का कल्याण ||
अहो दान की महिमा तीर्थंकर प्रभु तक लेते आहार |
उत्तम त्याग धर्म की जय जय हो जो है स्वर्ग मोक्ष दातार ||
ॐ ह्रीं उत्तमत्यागधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
धर्म साध उत्तम आकिंचन होऊँ ममत्व भाव से दूर |
चौदह अंतरंग दश बाहर के हैं जहाँ परिग्रह चूर ||
तृष्णाओं को जीता परद्रव्यों से राग नहीं किंचित |
सर्व परिग्रह त्याग मुनीश्वर विचरें वन में आत्माश्रित ||
परम ज्ञान परम ध्यानमय सिद्धस्वपद का दाता है |
उत्तम आकिंचन व्रत जग में श्रेष्ठ धर्म विख्याता है ||
ॐ ह्रीं उत्तमआकिंचनधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उत्तम ब्रह्मचर्य दुद्धर व्रत है सर्वोत्कृष्ट जग में |
कामवासना नष्ट किये बिन नहीं सफलता शिवमग में ||
विषय भोग अभिलाषा तज जो आत्मध्यान में रम जाते |
शील स्वभाव सजा दुर्मतिहर काम शत्रु पर जय पाते ||
परमशील की पवित्र महिमा ऋषि गणधर वर्णन करते |
उत्तम ब्रह्मचर्य के धारी ही भव सागर से तिरते ||
ॐ ह्रीं उत्तमब्रह्मचर्यधर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
समुच्चय-जयमाला
उत्तम क्षमा धर्म को धारूं क्रोध कषाय विनाश करूं |
पर पदार्थ को इष्ट अनिष्ट न मानूं आत्म प्रकाश करूं ||
उत्तम मार्दव धर्म ग्रहण कर विनय स्वरूप विकास करूं |
पर कर्तव्य मान्यता त्यागूँ अहंकार का नाश करूं ||
उत्तम आर्जव धर्म धार माया कषाय संहार करूं |
कपट भाव से रहित शुद्ध आतम का सदा विचार करूं ||
उत्तम शौच धर्म धारण क्र लोभ कषाय विनष्ट करूं |
शुचिमय चेतन से अशुद्ध ये चार घातिया कर्म हरूं ||
उत्तम सत्य धर्म से निर्मल निज स्वरूप को सत्य करूं |
हित-मिट-प्रिय सच बोलूँ निज-परिणति संग नृत्य करूं ||
उत्तम संयम धर्म सभी जीवों के प्रति करुणा धारूं |
समिति गुप्ति व्रत पालन करके निज आतम गुण विस्तारूं ||
उत्तम तप धर शुक्ल ध्यान से आठों कर्मों को जारूं |
अंतरंग-बहिरंग तपों से निज आतम को उजियारूं ||
उत्तम त्याग पांच पापों का सर्वदेश मैं त्याग करूं |
योग्य पात्र को योग्य दान दे उर में सहज विराग भरूं ||
उत्तम आकिंचन्य रागादिक भावों का परिहार करूं |
सर्व परिग्रह से विमुक्त हो मुनिपद अंगीकार करूं ||
उत्तम ब्रह्मचर्य उर धारूं आत्म ब्रम्ह में लीन रहूँ |
कामबाण विध्वंस करूं मैं शील स्वभाधीन रहूँ ||
दशलक्षणव्रत की महिमा का नित प्रति जय जय गान करूं |
दशधर्मों का पालन करके महा मोक्ष निर्वाण वरूं ||
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमामार्दवआर्जवशौचसंयमतपस्यागाकिंचनब्रह्मचर्य दशलक्षण धर्मेभ्य: जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।