देव-शास्त्र-गुरु भरतक्षेत्र सम, विदेहक्षेत्र तिष्ठहु महाराज |
भरत ऐरावत पंच-पंच के, तीस चौबीसी जिनराज ||1||
उर्ध्व, मध्य व अधोलोक के, कृत्रिम अकृत्रिम हैं जिनराज |
देवों कर पूजित मैं भी पूजहूँ, नितप्रति ध्याऊँ मन हरषाय ||2||
परम पूज्य श्री स्वयं सिद्धप्रभु, आवाहन हो हृदय मंझार |
सोलहकारण धर्म दश लक्षण, रत्नत्रय भी आन सम्भार ||3||
जिनबिम्ब पूजहूँ पंचमेरु के, जो-जो हैं जिनभवन जिनाय |
नन्दीश्वर बावन जिनमन्दिर, जिनबिम्बन आह्वाहन कराय ||4||
सिद्धक्षेत्र जो दसों क्षेत्र में, अतिशय क्षेत्र सर्वत्र महान |
तिनको पूजों मन-वच-तन से, जिससे हो आतम कल्याण ||5||
भूत भविष्यत वर्तमान के, होते हैं जितने जिनराय |
मम हृदय में आन विराजो, हर्ष सहित पूजों प्रभु पाय ||6||
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोकसंबंधी सकलनिकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलहकारणभावना, दशलक्षणधर्म, रत्नत्रयधर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोकसंबंधी सकलनिकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलहकारणभावना, दशलक्षणधर्म, रत्नत्रयधर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनसमूह! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोक संबंधी सकल निकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलह कारण भावना, दशलक्षण धर्म, रत्नत्रय धर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
जग समुद्र में डूब रहा हूँ, होते जन्म मरण करके |
भवसागर से पार करन को, मुक्ति मार्ग समझ करके ||
जल अर्पित है प्रभु चरणों में, संसर्ग कभी न हो मेरा |
सभी जिनेश्वर ध्याऊँ, हो सिद्धालय में डेरा ||
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोक संबंधी सकल निकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलह कारण भावना, दशलक्षण धर्म, रत्नत्रय धर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनेन्द्रभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
स्पर्शित चन्दन शूब किया, न पाई शीतलता मुझ में |
तप्त वेदना दूर करने को, ज्ञान बढ़े मेरे मन में ||
चन्दन अर्पित प्रभु चरणों में, संसर्ग कभी न हो मेरा |
सभी जिनेश्वर ध्याऊँ, हो सिद्धालय में डेरा ||
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोक संबंधी सकल निकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलह कारण भावना, दशलक्षण धर्म, रत्नत्रय धर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनेन्द्रभ्यो भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
पर वस्तु को मानी अपनी, खण्ड अवस्था पाई मैंने |
अब तक भूल रही थी मुझमें, अब दृढ़ता पाई मैंने ||
अक्षत अर्पित प्रभु चरणों में, संसर्ग कभी न हो मेरा |
सभी जिनेश्वर ध्याऊँ, हो सिद्धालय में डेरा ||
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोक संबंधी सकल निकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलह कारण भावना, दशलक्षण धर्म, रत्नत्रय धर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनेन्द्रभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
मधु सम मुग्ध हुए फिरता हूँ, कामवासना नहिं मेरी |
इनसे वंचित हो जाऊं तो, खिल जावें कलियाँ मेरी |
पुष्प अर्पित प्रभु चरणों में, संसर्ग कभी न हो मेरा |
सभी जिनेश्वर ध्याऊँ, हो सिद्धालय में डेरा ||
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोक संबंधी सकल निकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलह कारण भावना, दशलक्षण धर्म, रत्नत्रय धर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनेन्द्रभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
मोहक वस्तु जड़ की पोषक, भूल से स्वाद लिया मैंने |
आतम गुण बल अब मैं जाना, पर को जाना मैंने ||
नेवज अर्पित प्रभु चरणों में, संसर्ग कभी न हो मेरा |
सभी जिनेश्वर ध्याऊँ, हो सिद्धालय में डेरा ||
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोक संबंधी सकल निकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलह कारण भावना, दशलक्षण धर्म, रत्नत्रय धर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनेन्द्रभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
दीपशिखा सब जग की प्रेरक, अब जानी सारी विपदा |
भेदज्ञान की छैनी पावत, मिट जावे जग मी ममता ||
दीप समर्पित प्रभु चरणों में, संसर्ग कभी न हो मेरा |
सभी जिनेश्वर ध्याऊँ, हो सिद्धालय में डेरा ||
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोक संबंधी सकल निकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलह कारण भावना, दशलक्षण धर्म, रत्नत्रय धर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनेन्द्रभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
भूल से जाना अब तक मैंने, हूँ स्वयं पर का कर्ता |
ये कर्म अनादि से चिपटे थे, सो हम नहिं पर का कर्ता ||
धुप समर्पित प्रभु चरणों में, संसर्ग कभी न हो मेरा |
सभी जिनेश्वर ध्याऊँ, हो सिद्धालय में डेरा ||
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोक संबंधी सकल निकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलह कारण भावना, दशलक्षण धर्म, रत्नत्रय धर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनेन्द्रभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
पाप-पुण्य मैं करता आया, सुख-दुःख फल जाना अपना |
जग फल भी अपनाक्र माना, नहीं पाई सुख की सपना ||
जग फल अर्पित प्रभु चरणों में, संसर्ग कभी न हो मेरा |
सभी जिनेश्वर ध्याऊँ, हो सिद्धालय में डेरा ||
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोक संबंधी सकल निकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलह कारण भावना, दशलक्षण धर्म, रत्नत्रय धर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनेन्द्रभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
मनुष्य जन्म उत्तम कुल पाया, जैन धर्म सम्यकत्रय ज्ञान |
विरद तिहारा सबसे न्यारा, धर महाव्रत पाऊँ निर्वाण ||
अष्ट अर्घ्य अर्पित प्रभु चरणों में, संसर्ग कभी न हो मेरा |
सभी जिनेश्वर ध्याऊँ, हो सिद्धालय में डेरा ||
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोक संबंधी सकल निकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलह कारण भावना, दशलक्षण धर्म, रत्नत्रय धर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनेन्द्रभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(सोरठा)
नमन करूं अरहंत, सिद्ध नमूं सुख कारणे |
साधु नमूं निर्ग्रन्थ, जयमाला वर्णन करूं ||
सकल निकल जिनदेव हैं, कथनी श्रुति भवतार |
गुरु आचारज सर्व ही, मुक्ति मार्ग दातार ||
सीमंधरादि जानिया, विदेह क्षेत्र संझार |
बीस तीर्थंकर सहित के, चरण नमूं चित धार ||
पांच भरत पांच ऐरावत, तीस चौबीसी जिनाय |
तिनकूं पूजूं भाव धरि, मेरे कर्म नशाय ||
ऊर्ध्व मध्य अधोलोक के, श्रीजिन भवन विचार |
नन्दीश्वर पंचमेरु को, पूजूं बारम्बार ||
अरहंत स्वामी को नमूं, सिद्ध बसे शिवलोक |
आचारज उवझायरू, साधु चरनन धोक ||
सोलहकारण भावना, दशलक्षण चित्त धार |
रत्नत्रय आराधना, शिवसुख की करतार ||
आदिश्वर मोटा धणी, अजितनाथ भगवान |
सम्भव जिनके चरणरू, अभिनन्दन धरूं ध्यान ||
सुमतिनाथ पायन परूँ, पद्मनाथ जिनदेव |
सुपार्श्व प्रभु वन्दन करूं, चन्द्रप्रभु की सेव ||
पुष्पदन्त जिनराज जी, श्री शीतल सुखकार |
श्रेयांसनाथ रक्षार्थी, वासुपूज्य भवतार ||
विमल विमल मति देत हैं, अनंतनाथ शिवसुख |
धर्मनाथ दे धर्म को, शांति हरे सब दुख ||
कुंथुनाथ वन्दन करूं, अरहनाथ गुण गाय |
मल्लिनाथ सेवूँ सदा, मुनिसुव्रत सुखदाय ||
नमिनाथ जिनराय जी, नेमिनाथ करतार |
पार्श्वनाथ पूजूं सदा, सन्मति वरि शिवनार ||
चौबीसों जिनराज को, प्रणमूं बारम्बार |
नित वन्दन पूजन करूं, होऊं भवदधि पार ||
सम्मेद शिखर तीरथ बडो, गिरनारी भगवान |
चम्पापुरी पावापुरी, कैलाश निर्वाण ||
सिद्ध क्षेत्रादि अनेक हैं, अतिशय क्षेत्र अनेक |
तिनकूं वंदूं भाव धरि, रखना मेरी टेक ||
नमन करूं चरणन विषैं, अहो गरीब नवाज |
संकट से तारो मुझे, भोगूं शिवपुर राज ||
अष्ट द्रव्य अर्चन करूं, करहूँ प्रभु का ध्यान |
आर्त रौद्र मिटाय के, मिलसी अविचल थान ||
ॐ ह्रीं श्री त्रिलोक संबंधी सकल निकल देव, शास्त्र, गुरु समूह, सोलह कारण भावना, दशलक्षण धर्म, रत्नत्रय धर्म, समस्त क्षेत्रस्थ जिनेन्द्रभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलि क्षिपेत