श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्र का अर्घ्य

जल गंध आदि मिलाय आठों, दरब अरघ सजूं वरूं |
पूजूं चरन रज भगति जुत, जा तें जगत सागर तरूं ||
शिव साथ करत सनाथ सुव्रतनाथ, मुनि गुनमाल हैं |
तसु चरन आनंद भरन तारन, तरन विरद विशाल हैं ||

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रत जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||

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