जिनवाणी के ऑनलाइन संकलन का एक प्रयास
श्री नमिनाथ जिनेन्द्र का अर्घ्य
जल-फल आदि मिलाय मनोहरं, अरघ धारत हि भवभय हरं |
जजत हूँ नमि के गुण गाय के, जुग पदांबुज प्रीति लगाय के ||
ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||
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