जल फल सब सज्जै बाजत बज्जै, गुन-गन रज्जै मन भज्जै |
तुअ पड जग मज्जै सज्जन सज्जै, ते भव भज्जै निज कज्जै ||
श्री अजित जिनेशं नूतनाकेशं, चक्रधरेशं ख्ग्गेशं |
मनवांछित दाता त्रिभुवन त्राता, पूजूं ख्याता ज्गगेशं ||
ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||