जल चन्दन तंदुल प्रसून चरु, दीप फल अर्घ किया |
तुमको अपरूं भाव भक्ति धर, जै जै जै शिव रमनि पिया ||
संभव के जिन चरन चरचतें, सब आकुलता मिट जावे |
निजि निधि ज्ञान दरश सुख वीरज, निराबाध भविजन पावे ||
ॐ ह्रीं श्री सम्भवनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||