स्थापना
धर्मनाथ जिनवर चरणों में, अपना शीश झुकाता |
सूरज से भी तेज उजाला, नाथ आपमें पाता ||
कृपा दृष्टि मिल जाए तो मैं, बिना पंख उड़ सकता |
मध्य लोक से लोक शिखर तक, क्षण भर में जा सकता ||
यदि आप मम गृह आये तो, कर्मों से लड़ पाऊं |
शाश्वत मुझमें ठहर गये टो, तुम जैसा बन जाऊं ||
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
द्र्व्यार्पण
शुद्ध ज्ञान का जल भर लाय, धार देत त्रय शांति कराय |
परम जिनराय, जय-जय नाथ परम सुखदाय ||
आतम का ध्यान करूं उपाय, धर्मनाथ जिनवर गुणगाय |
परम जिनराय, जय-जय नाथ परम सुखदाय ||1||
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
निज स्वभाव चन्दन सुखदाय, मन को अतिशय तृप्त कराय |
परम जिनराय, जय-जय नाथ परम सुखदाय ||2||
आतम का ध्यान...
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
सांसारिक पद नहीं सुहाय, उत्तम अक्षय ध्रुव पद पाय |
परम जिनराय, जय-जय नाथ परम सुखदाय ||3||
आतम का ध्यान...
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
शील पुष्प की सुरभि प्रदाय, कामदेव को शीघ्र भगाय |
परम जिनराय, जय-जय नाथ परम सुखदाय ||4||
आतम का ध्यान...
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
वन्दन तीनों काल जिनाय, क्षुधा रोग अविब्म्ब नशाय |
परम जिनराय, जय-जय नाथ परम सुखदाय ||5||
आतम का ध्यान...
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान ज्योति शाश्वत जल लाय, कर्म हवा बुझा न पायें |
परम जिनराय, जय-जय नाथ परम सुखदाय ||6||
आतम का ध्यान...
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
धर्म धूप साधन बन जाए, अष्ट कर्म विध्वंस कराय |
परम जिनराय, जय-जय नाथ परम सुखदाय ||7||
आतम का ध्यान...
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
भक्ति भाव से जिन गुणगाय, प्रभु कृपा से शिव फल पाय |
परम जिनराय, जय-जय नाथ परम सुखदाय ||7||
आतम का ध्यान...
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुभ भावों से अर्घ्य बनाय, पद अनर्घ्य जिनवर दर्शाय |
परम जिनराय, जय-जय नाथ परम सुखदाय ||7||
आतम का ध्यान...
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचकल्याणक
(सखी छंद)
सर्वार्थसिद्धि तज आये, सुरबाला मंगल गाये |
तेरस वैशाख वदी है, माँ सुव्रता उर हर्षी है ||1||
ॐ ह्रीं वैशाखकृष्णत्रयोदश्यां गर्भमंगलमंडिताय श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सुद माघ त्रयोदशी आयी, प्रभु जन्मोत्सव सुखदायी |
नृप भानुराज हर्षाये, तीर्थंकर सुत को पाये ||2||
ॐ ह्रीं माघशुक्लत्रयोदश्यां जन्ममंगलमंडिताय श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जब जन्मोत्सव की खुशियाँ थीं, तब उल्कापात हुयी थी |
वैराग्य धरे जिनराजा, इक लाख संग मुनिराजा ||3||
ॐ ह्रीं माघशुक्लत्रयोदश्यां तपोमंगलमंडिताय श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जब पौष पूर्णिमा आई, प्रभु केवलज्ञान उपाई |
प्रभु राजे हैं पद्मासन, है दिव्य आपका शासन ||4||
ॐ ह्रीं पौषशुक्लपूर्णिमायां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सुदी ज्येष्ठ चतुर्थी आई, शिवरमा वरी जिनराई |
सूदत्त कूट मन भाया, सम्मेद शिखर सर नाया ||5||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णचतुर्थ्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जाप्य
ॐ ह्रीं अर्हम श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय नमो नम:
जयमाला
(दोहा)
धर्मनाथ तीर्थेश के, गुण है नंतान्त |
गुणमाला कंठे धरे, होता भव का अंत ||1||
(चौपाई)
धर्मनाथ जिनवर को वंदूं, धर्म विधायक विभुवर वंदूँ |
भानुराज सुत को अभिनंदूँ, मात सुव्रता नंदन वंदूँ ||2||
चार ध्यान उपदेशक वंदूँ, धर्मध्यान आराधक वंदूँ |
शुक्लध्यान के धारक वंदूँ, प्राणीमात्र उपकारक वंदूँ ||3||
कूट सुद्त्त अधीश्वर वंदूँ, सिद्धालय के वासी वंदूँ |
कर्म अरिंजय स्वामी वंदूँ, मृत्युंजय अभिनामी वंदूँ ||4||
चिन्मय चिदानन्द जिन वंदूँ, परमानन्द जिनेश्वर वंदूँ |
परम शांत मूरत अभिवंदूँ, महापुज्य त्रिपुरारि वंदूँ ||5||
पंचम गति के दायक वंदूँ, इन्द्रिय रहित जिनेश्वर वंदूँ |
काय रहित निष्कायक वंदूँ, योग रहित योगीश्वर वंदूँ ||6||
वेद रहित जिन लिंगी वंदूँ, रहित कषाय जिनेश्वर वंदूँ |
ज्ञानी परम संयमी वंदूँ, केवलदर्शी जिन को वंदूँ ||7||
लेश्यातीत भाव को वंदूँ, भाव्यातीत दशा को वंदूँ |
क्षायिक समकित जिन को वंदूँ, सैनी रहित मार्गणा वंदूँ ||8||
सदा अनाहारी प्रभु वंदूँ, ज्ञान शरीरी जिनवर वंदूँ |
पन्द्रहवें तीर्थेश्वर वंदूँ, धर्मनाथ अखिलेश्वर वंदूँ ||9||
ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घयं निर्वपामीति स्वाहा ||
(घत्ता)
हे धर्म दिवाकर, गुण रत्नाकर, भव-भव का संताप हरो |
नित पूजा रचाऊं, ध्यान लगाऊं, भक्त को अब पूर्ण करो ||