स्थापना
(अडील्ल छंद)
अनंत ज्ञानी ज्योतिर्मय जिनराय जी |
कर्म अंत कर मोक्ष गये शिवराय जी ||
करुणाकर स्वीकारो प्रभु वन्दन मेरा |
आ गया चरणों में मेटो भव फेरा ||1||
शक्ति जब तक मुझमें दर ना छोडूंगा |
जैसी आज्ञा प्रभु आपकी मानूंगा ||
आह्वाहन करता हूँ नाथ आ जाओ |
भावों के उच्चासन प्रभु स्म जाओ ||2||
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
द्र्व्यार्पण
अनादि काल से जनम मरण किया प्रभो |
इक बार भी सम्यक मरण नहीं किया विभो ||
अनंत ज्ञान हेतु नाथ प्रार्थना करूं |
जन्म मृत्यु के नाश हेतु अर्चना करूं ||1||
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
शीतल मलय सुगन्धित चन्दन है चढाया |
भवताप मिटाने प्रभो शरण में हूँ आया ||
अनंत ज्ञान हेतु नाथ प्रार्थना करूं |
संसार ताप नाश हेतु अर्चना करूं ||2||
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
अक्षय प्रभु अनंतनाथ सुख निधान हैं |
नश्वर दुखों में रूल रहा दुःख महान है ||
अनंत ज्ञान हेतु नाथ प्रार्थना करूं |
अखंड पद की प्राप्ति हेतु अर्चना करूं ||3||
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
निष्काम आप नाम है न कोई काम है |
न नाम है न धाम है निज में विराम है ||
अनंत ज्ञान हेतु नाथ प्रार्थना करूं |
अखंड ब्रम्हचर्य हेतु अर्चना करूं ||4||
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
आनन्द सरोवर निम्ग्म आप है प्रभो |
तृष्णा के जाल में फंसा उबार लो प्रभो ||
अनंत ज्ञान हेतु नाथ प्रार्थना करूं |
क्षुधा व्यथा के नाश हेतु अर्चना करूं ||5||
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
ज्ञान भानु का उदय हुआ प्रभु तुम्हें |
दिखता नहीं अज्ञान अन्धकार में हमें ||
अनंत ज्ञान हेतु नाथ प्रार्थना करूं |
ज्ञान के प्रकाश हेतु अर्चना करूं ||6||
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
द्रव्य कर्म भाव कर्म नाश कर दिए |
ध्यान लीं हो गये निज दर्श पा लिए ||
अनंत ज्ञान हेतु नाथ प्रार्थना करूं |
अष्ट कर्म मेटने को अर्चना करूं ||7||
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
भौतिक सुखों की कामना से धर्म भी किया |
अतएव क्रिया मात्र से शिवशर्म ना लिया ||
अनंत ज्ञान हेतु नाथ प्रार्थना करूं |
मोक्षलक्ष्मी प्राप्ति हेतु अर्चना करूं ||8||
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
वसु द्रव्य लेय श्रेष्ठ आतम द्रव्य मिलाऊं |
अनंतनाथ के चरण में शीघ्र चढाऊँ ||
अनंत ज्ञान हेतु नाथ प्रार्थना करूं |
सिद्ध पद के हेतु नाथ अर्चना करूं ||9||
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचकल्याणक
(सखी छंद)
कार्तिक कृष्णा एकम को, आये अपने माता को |
पुष्पोत्तर तजकर आये, सुर न्र मुनि जन हर्षाये ||1||
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णप्रतिपदायां गर्भमंगलमंडिताय श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयेष्ठ वदी बारस आई, सुर गृह गूंजी शहनाई |
नृप सिंहसेन हर्षाये, सारी साकेत सजाये ||2||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णद्वादशयां जन्ममंगलमंडिताय श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
बजी जन्मोत्सव की बधाई, उल्का गिरने को आई |
तब एक हजार नृप संग में, दीक्षा ली सहेतुक वन में ||3||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णद्वादशयां तपोमंगलमंडिताय श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जब चैत्र अमा काली थी, तब ज्ञान सूर्य लाली थी |
प्रभु समवशरण में राजे, और बारह सभा विराजे ||4||
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णामावस्यायां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जब केवलज्ञान हुआ था, उस तिथि में मोक्ष हुआ था |
गिरि शिखर स्वयंभू कूट, प्रभु गये करम से छूट ||5||
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णामावस्यायां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जाप्य
ॐ ह्रीं अर्हम श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय नमो नम:
जयमाला
(दोहा)
अनंत गुणयुक्त हैं, अनंत जिन भगवंत |
गुणमाला अर्पण करूं, पा जाऊं शिवपन्थ ||1||
(ज्ञानोदय छंद)
जय-जय चौदहवें तीर्थकर, अनंतनाथ प्रभु दया निधान |
दे उपदेश भव्य जीवों को, करते आप सदा कल्याण ||
दीक्षा धर सर्वग्य हुए जब, जन-जन का उद्धार किया |
रत्नत्रयमय मोक्ष मार्ग है, दिव्यध्वनि का सार दिया ||2||
जीव समास चतुर्दश चौदह, मुख्य मार्गणा बतलाई |
गुणस्थान जीवों के चौदह, परिभाषा भी बतलाई ||
तत्वों का श्रद्धान नहीं वह, मिथ्यातम कहलाता है |
उपशम समकित से गिरकर ही, सासादान में आता है ||3||
सम्यक मिथ्या दही गुड मिश्रित, भाव मिश्र गुण में आते |
चौथे अविरत सम्यग्दृष्टि, स्व-पर तत्व श्रद्धा लाते ||
त्रस थावर में विरताविरति, पंचम देश विरत कहते |
संयम सकल प्रगट हो जाता, उसे प्रमत्तविरत कहते ||4||
जहाँ संज्वलन मंद उदय हो, अप्रमत्तविरति होते |
अष्टम गुण से ही उपशम औ, क्षपक श्रेणी भी चढ़ जाते ||
कभी पूर्व में प्राप्त हुए ना, वो अपूर्व परिणाम धरे |
नवमां है अनिवृत्तिकरण समकालीन भाव अभेद धरे ||5||
दशम सूक्ष्म सांपराय गुण हैं, सूक्ष्म लोभ का उदय रहे |
पूर्ण रूप से दबे मोह तो, ग्यारहवां गुणस्थान कहे ||
सकल मोह का क्षय हो जाता, क्षीण मोह द्वादश प्यारा |
चार घतिया नाश हुए तो, सयोग केवली गुण न्यारा ||6||
योग नाश कर चौदहवाँ शुभ, योग केवली थान कहा |
कर्म नष्ट कर सिद्धक्षेत्र में, पहुंच गये हैं सिद्ध महा ||
ज्ञाता दृष्टा रहे जीव तो, राग-द्वेष मिट जाता है |
स्व सन्मुख दृष्टि जो रखता, मोक्ष परम पद पाता है ||7||
समवस्रती में प्रभु आपने, इस विध जो उपदेश दिया |
दिव्यध्वनि सुन लगा मुझे यों, चिदानंद निज देश दिया ||
हर्ष भाव से पुलकित होकर, प्रभु मैंने की है पूजन |
पूजा का सम्यक फल होवे, कटे हमारे भव बंधन ||8||
ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घयं निर्वपामीति स्वाहा ||
(घत्ता)
जय जय जिनवर जी, अनंतनाथ जी, भव-भव का संताप हरो |
नित पूजा रचाऊं, ध्यान लगाऊं, भक्त को अब पूर्ण करो ||