समाधि भावना

दिन-रात मेरे स्वामी मैं भावना ये भाऊँ |
देहांत के समय मैं तुमको न भूल जाऊं ||1||
शत्रु अगर कोई हो संतुष्ट उनको कर दूं |
समता का भाव धर कर सबसे क्षमा कराऊँ ||2||
त्यागूँ आहार पानी औषध विचार अवसर |
टूटे नियम न कोई दृढ़ता हृदय में लाऊं ||3||
जागें नहीं कषायें नहीं वेदना सतावे |
तुमसे ही लौ लगी हो दुर्ध्याँन को भगाऊं ||4||
आतम स्वरूप अथवा आत्मा विचारूं |
अरहंत सिद्ध साधू रटना यही लगाऊं ||5||
धर्मात्मा निकट हों चर्चा धर्म सुनावें |
ये सावधान रखें गाफिल न हो पाऊँ ||6||
जीने की न हो इच्छा, मरने की हो वांछा |
परिवार मित्र जन से मोह को हटाऊँ ||7||
भोगे जो भोग पहले, उनका न होवे स्मरण |
मैं राज्य, सम्पदा या पद इंद्र न चाहूँ ||8||
रत्नत्रय का हो पालन, हो अंत में समाधि |
भक्त करे यह प्रार्थना, जीवन सफल बनाऊँ ||9||

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