आदिनाथ के युगल चरण में, श्रद्धा पुष्प चढ़ाता हूँ |
प्रभु की मंगल आराधना में, भक्ति गीता गाता हूँ ||
दिव्य मनोहर वृक्षों से, देख देख कर अक्षो से |
पुष्प सुगन्धित लाते हैं, पुष्प वृष्टि कर जाते हैं ||
पारिजात नमेरु सुमन, सन्तानक सुंदर ये सुमन |
सुर गण मिल कर आते हैं, पुष्प वृष्टि कर जाते हैं ||
जिनवर का यह पुण्य प्रताप, झुक झुक कर आपो आप |
भीनी भीनी मंद पवन, प्रभु में चरणों में करे नमन ||
पुष्प सुगन्धित रहते गिरते हैं, आस पास ही रहते हैं |
अहो! भाग्य उन पुष्पों का, स्पर्श उन चरणों का ||
मानतुंग की इस बगिया को, सबके हृदय लगाऊंगा |
सदभक्तों को, सदपुरषों को, शोभावान बनाऊंगा ||
ॐ ह्रीं पुष्पवृष्टि सत्प्रतिहायार्य श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||