जल गन्धाक्षत फूल सु नेवज लीजिये |
दीप धूप फल लेकर अर्घ्य चढ़ाइये ||
पूजों शिखरसम्मेद सु मन-वच-काय जू |
नरकादिक दुख टरै अचलपद पाय जू ||
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र पर्वतसेती बीसतीर्थंकरादि असंख्यात मुनि मुक्ति पधारे तिनको नम: अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||