जिनवाणी के ऑनलाइन संकलन का एक प्रयास
श्री महावीर जिनेन्द्र का अर्घ्य
जल फल वसु सजि हिम थार, तन मन मोद धरूं |
गुण गाऊँ भव दधितार, पूजत पाप हरूं ||
श्री वीर महा-अतिवीर, सन्मति नायक हो |
जय वर्धमान गुणधीर, सन्मति दायक हो ||
ॐ ह्रीं श्री महावीर जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||
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