पांच भरत शुभ क्षेत्र पांच एरावते
आगत नागत वर्तमान जिन सास्वते |
ओस चौबीसी तीस जजूं मन लायके
आह्वाहन विधि करूं बार त्रय गायके ||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरा:!
अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरा: !
अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरा:!
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
नीर दधि हम ल्यायो, कनक को भृंग भरवायो |
अबै तुम चरण ढिग आयो, जन्म-मृत्य रोग नशवायो ||
द्वीप ढाई सरस राजै, क्षेत्र दश ता विषै छाजै |
सात शत बीस जिनराजै, पूजतां पाप सब भाजै ||1||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
सुरभिजुत चन्दनं ल्यायो, संग करपूर घसवायो |
धार तुम चरण ढरवायो, भव-आताप नशवायो ||
द्वीप ढाई सरस राजै, क्षेत्र दश ता विषै छाजै |
सात शत बीस जिनराजै, पूजतां पाप सब भाजै ||2||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरेभ्यो भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
चन्द्रसम तंदुलं सारं, किरन मुक्ता जु उनहारं |
पुंज तुम चरणढिगं धारं, अक्षयपद प्राप्ति के कारं ||
द्वीप ढाई सरस राजै, क्षेत्र दश ता विषै छाजै |
सात शत बीस जिनराजै, पूजतां पाप सब भाजै ||3||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
पुष्प शुभ गंधजुत सोहे, सुगन्धित तासु मन मोहे |
जजत तुम मदन क्षय होवे, मुक्तिपुर पलक में जोवे ||
द्वीप ढाई सरस राजै, क्षेत्र दश ता विषै छाजै |
सात शत बीस जिनराजै, पूजतां पाप सब भाजै ||4||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
सरस व्यंजन लिया ताजा, तुरत बनवाया खाजा |
चरन तुम जजत महाराजा, क्षुधा-दुःख पलक में भाजा ||
द्वीप ढाई सरस राजै, क्षेत्र दश ता विषै छाजै |
सात शत बीस जिनराजै, पूजतां पाप सब भाजै ||5||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
दीप तम नाशकारी है, सुरभि जुत ज्योति धारी है |
दशों दिश कर उजारी है, धूम्र मिस पाप छारी है ||
द्वीप ढाई सरस राजै, क्षेत्र दश ता विषै छाजै |
सात शत बीस जिनराजै, पूजतां पाप सब भाजै ||6||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
सुगन्धित धुप दश अंगी, जलाऊं अग्नि के संगी |
करम की सैन्य चतुरंगी, पूजतैं पाप सब भंगी ||
द्वीप ढाई सरस राजै, क्षेत्र दश ता विषै छाजै |
सात शत बीस जिनराजै, पूजतां पाप सब भाजै ||6||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
मिष्ट उत्कृष्ट फल ल्यायो, अष्ट अरि दुष्ट नशवायो |
श्रीजिन भेंट धरवायो, कार्य मनावंछ्ता पायो ||
द्वीप ढाई सरस राजै, क्षेत्र दश ता विषै छाजै |
सात शत बीस जिनराजै, पूजतां पाप सब भाजै ||6||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
द्रव्य आठों जु लीना है, अर्घ कर में नवीना है |
पूजतैं पाप छीना है, भक्त जोड़ कीना है ||
द्वीप ढाई सरस राजै, क्षेत्र दश ता विषै छाजै |
सात शत बीस जिनराजै, पूजतां पाप सब भाजै ||6||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सात सौ बीस तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(प्रत्येक अर्घ)
जम्बूद्वीप के प्रथम मेरु की, दक्षिण दिशा भरत शुभ जान |
तहां चौबीसी तीन विराजैं, आगन नागत औ वर्तमान ||
तिनके चरन कमल को निशदिन अर्घ चढाय करूं उर ध्यान |
इस संसार भ्रमणतैं तारो, अहो! जिनेश्वर करुणावान ||
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरु की दक्षिणदिशि भरतक्षेत्र सम्बन्धि भूतानागत वर्तमान तीन चौबीसी सम्बन्धि बहत्तर तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सुदर्शनमेरु की उत्तर दिशा में, ऐरावत क्षेत्र शुभ जान |
आगत नागत वर्तमान जिन, बहत्तर सदा सास्वते जान ||
तिनके चरन कमल को निशदिन अर्घ चढाय करूं उर ध्यान |
इस संसार भ्रमणतैं तारो, अहो! जिनेश्वर करुणावान ||
ॐ ह्रीं श्री सुदर्शनमेरु की उत्तरदिशि ऐरावतक्षेत्र सम्बन्धि भूतानागत वर्तमान तीन चौबीसी सम्बन्धि बहत्तर तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
खंड धातकी विजयमेरु के, दक्षिण दिशा भरत शुभ जान |
तहां चौबीसी तीन विराजैं, आगन नागत अरु वर्तमान ||
तिनके चरन कमल को निशदिन अर्घ चढाय करूं उर ध्यान |
इस संसार भ्रमणतैं तारो, अहो! जिनेश्वर करुणावान ||
ॐ ह्रीं श्री धातकीखंड पूर्व दिशा में स्थित विजयमेरु की दक्षिणदिशि भरतक्षेत्र सम्बन्धि भूतानागत वर्तमान तीन चौबीसी सम्बन्धि बहत्तर तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
इसी द्वीप की प्रथम शिखर की, उत्तर ऐरावत जु जान |
आगत नागत वर्तमान जिन, बहत्तरि सदा सासते जान ||
तिनके चरन कमल को निशदिन अर्घ चढाय करूं उर ध्यान |
इस संसार भ्रमणतैं तारो, अहो! जिनेश्वर करुणावान ||
ॐ ह्रीं श्री धातकीखंड पूर्व दिशा में स्थित विजयमेरु की उत्तरदिशि ऐरावतक्षेत्र सम्बन्धि भूतानागत वर्तमान तीन चौबीसी सम्बन्धि बहत्तर तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(चौपाई)
खंड धातकी अचल सुमेरु, दक्षिण तास भरत चहूँ घेर |
तामें चौबीसी त्रय जान, आगत नागत अरु वर्तमान ||
ॐ ह्रीं श्री धातकीखंड पश्चिम दिशा में स्थित अचलमेरु की दक्षिणदिशि भरतक्षेत्र सम्बन्धि भूतानागत वर्तमान तीन चौबीसी सम्बन्धि बहत्तर तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
अचल मेरु दिश जान, ऐरावत शुभ क्षेत्र बखान |
तामें चौबीसी त्रय जान, आगत नागत अरु वर्तमान ||
ॐ ह्रीं श्री धातकीखंड पूर्व दिशा में स्थित अचलमेरु की उत्तरदिशि ऐरावतक्षेत्र सम्बन्धि भूतानागत वर्तमान तीन चौबीसी सम्बन्धि बहत्तर तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(सुन्दरी छंद)
द्वीप पुष्कर की पूर्व दिशा, मन्दर मेरु की दक्षिण भरत सा |
ता विषैं चौबीसी तीन जू, अर्घ लेय जजूं परवीन जू ||
ॐ ह्रीं श्री पुष्करार्ध द्वीप की पूर्व दिशा में स्थित मन्दरमेरु की दक्षिणदिशि भरतक्षेत्र सम्बन्धि भूतानागत वर्तमान तीन चौबीसी सम्बन्धि बहत्तर तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
गिरि सु मन्दर उत्तर जानिये, क्षेत्र ऐरावत सु बखानिये |
ता विषैं चौबीसी तीन जू, अर्घ लेय जजूं परवीन जू ||
ॐ ह्रीं श्री पुष्करार्ध द्वीप की उत्तर दिशा में स्थित मन्दरमेरु की उत्तरदिशि ऐरावतक्षेत्र सम्बन्धि भूतानागत वर्तमान तीन चौबीसी सम्बन्धि बहत्तर तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(पद्धरि छंद)
पश्चिम पुष्करगिरि विद्युन्माल, ताके दक्षिण भरतसु विशाल |
तामें चौबीसी हैं जु तीन, वसु द्रव्य ले पूजूं प्रवीन ||
ॐ ह्रीं श्री पुष्करार्ध द्वीप की उत्तर दिशा में स्थित विद्युन्मीलीमेरु की उत्तरदिशि ऐरावतक्षेत्र सम्बन्धि भूतानागत वर्तमान तीन चौबीसी सम्बन्धि बहत्तर तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
द्वीप अढाई के विषै, पंचमेरु हित दाय |
दक्षिण उत्तर तासु कै, भरत ऐरावत भाय ||
भरत ऐरावत भये, एक क्षेत्र के माहीं |
चौबीसी हैं तीन, दशों दिशि हि के ठाहीं ||
दशों क्षेत्र के तीस सात सौ बीस जिनेश्वर |
अर्घ लेय कर जोड़ी जजों मनशुद्ध मुदित कर ||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सप्तशतविंशति तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
चौबीसी तीसों नमो, पूजा परम रसाल |
मन-वच-तन को शुद्ध करि, अब वर्णों जयमाल ||
(पद्धरि)
जय द्वीप अढाई मध्य सार, गिरि पांच मेरु उन्नत अपार |
तागिरि पूर्व-पश्चिम जु ओर, शुभक्षेत्र विदेह बसै जुठौर ||1||
ता दक्षिण क्षेत्र भरत सु जानि, है उत्तर ऐरावत महान |
गिरि पांच तनैं दश क्षेत्र जोय, ताको वरनन सब सुनो लोय ||2||
है भरतक्षेत्र दक्षिण जु व्यास, ऐरावत ताहि प्रमाण भास |
इक क्षेत्र बीच विजयार्द्ध एक, ता ऊपर विद्याधर अनेक ||3||
इक क्षेत्र विषैं षट खंड जानि, तहां छहों काल बरतैं महान |
जो तीन काल में भोगभूमि, दस जाति कल्पतरु रहे झूमि ||4||
जब चौथो काल लगै जु आय, तब कर्मभूमि वतैं सुभाय |
तब तीर्थंकर को जन्म होय, सुरलेय जजैं गिरि पर सुजोय ||5||
बहु भक्ति करें सब देव आय, ताथेई थेई-थेई की तान लाय |
हरि तांडव नृत्य करें अपार, सब जीवन मन आनन्दकार ||6||
इत्यादि भक्ति करके सुरेन्द्र, जिनथान जाय जुत देव वृंद |
याही विधि कल्याण जान, हरिभक्ति करै अति हर्ष ठान ||7||
या कालविषै पुण्यवंत जीव, नरजन्म धार शिवलहै अतीव |
जे त्रेसठ पुरुष प्रधान होय, सब याही काल विषै जु होय ||8||
जब पंचम काल करे प्रवेश, मुनि धर्म रहे कहूँ-कहूँ प्रदेश |
बिरले कोई दक्षिन देश मांही, जिनधर्मी नर बहुते जु नाहीं ||9||
जब षष्टम काल करे प्रवेश, दुःख हि दुःख व्यापै सर्व देश |
तब मांसभक्षी नर सर्व होय, जंह धर्म नाम सुनिए न कोय ||10||
या विधि दश क्षेत्र मंझार सार, इहकाल फिरन सब एकसार |
ह्र्द पर्वत नदि रचना प्रमान, आगम अनुकूल लखो सुजान ||11||
इक क्षेत्र चौबीसी तीन जान, आगत नागत अरु वर्तमान |
दश क्षेत्र सातशत जोड़ बीस, नित वन्दन करूं कर जोड़ शीश ||12||
सबही जिनराज नमों त्रिकाल, मोहि भवसागर से लेहु निकाल |
मम हृदय मध्य तिष्ठो जिनेश, काटो भवफंद जजों जगेश ||13||
भक्त की विनति सुनहू नाथ, तुम शरण लई कर जोड़ी हाथ |
मनवांछित कारज सार-सार, यह अरज हिये में धार-धार ||14||
(घत्ता)
शत सातजु बीसं, श्रीजगदीशं, आगत नागत वर्ततु है |
मनवचन पूजै, शुध-मन हूजै, सुरग-मुक्ति पद धरत जु है ||
ॐ ह्रीं श्री पंचभरतैरावत क्षेत्रस्थ पंचमेरुसम्बन्धि भूतानागत वर्तमान सम्बन्धि सप्तशतविंशति तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये जयमाला अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
सम्वत सत उन्नीस के, ता ऊपर पुनि आठ |
पौष कृष्ण तृतीया गुरु, पूरन भ्यो जु पाठ ||
अखर मात्रा की कसर, बुध-जन शुद्ध करेय |
अल्पबुद्धि मोहि जानके, दोष कबहूँ नहिं देय ||
पढयो नहीं व्याकरण मैं, पिंगल देख्यो नाहिं |
जिनवाणी परसादतैं, उमंग भई घट माहीं ||
मान बढाई ना चहूँ, चहूँ धर्म को अंग |
नित प्रति पूजा कीजियो, मन में धारि उमंग ||
इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलि क्षिपेत