देव-शास्त्र-गुरु का अर्घ्य

जल परम उज्ज्वल गंध अक्षत, पुष्प चरु दीपक धरूं |
वर धुप निर्मल फल विविध, बहु जनम के पातक हरूं ||
इह भांति अर्घ्य चढ़ाय नित भवि, करत शिव पंकति मचूं |
अरिहंत श्रुत सिद्धांत गुरु निर्ग्रन्थ नित पूजा रचूँ ||
वसुविधि अर्घ्य संजोय के, अति उछाह मन कीन |
जा सों पूजूं परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन ||

ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||

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