(चौबेला छंद)
भव-भयहारी संभव जिन के, श्री चरणों में करूं नमन |
निज चैतन्य विहारी जिनवर, दूर करो मेरे बंधन ||
द्रव्य भाव नोकर्म रहित जो, सिद्धालय के वासी हैं |
मन मन्दिर में आन बसो, हम जिन पद अभिलाषी हैं ||1||
ॐ ह्रीं श्रीसंभवजिनेन्द्र! अत्र अवतर संवौषट आह्वाहनंम |
ॐ ह्रीं श्रीसंभवजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ: तिष्ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्रीसंभवजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
द्र्व्यार्पण
पावन समता रस नीर, पाने मैं आया |
प्रभु जन्म-मृत्यु को क्षीण, करने हूँ आया ||
हे करुणा के अवतार, संभव जिन स्वामी |
दो शाश्वत सुख हितकार, हे अन्तर्यामी ||1||
ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ||
समता सर चन्दन नाथ, अब तक न पाया |
अब भवताप का नाश, करने मैं आया ||2||
हे करुणा...
ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
अविनश्वर पद का नाथ, मुझको ज्ञान नहीं |
शब्दों से किया है ज्ञान, निज पहचान नहीं ||3||
हे करुणा...
ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा |
इन्डिय के विषय जिनेश, मम मन को भाये |
निज शील रूप का दर्श, अब करने आये ||4||
हे करुणा...
ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय जिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
तृष्णा का उदर विशाल, अब तक है खाली |
आनन्द अमृत से आज, भर दो ये प्याली ||5||
हे करुणा...
ॐ ह्रीं श्रीसम्भवनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
तिहुँलोक प्रकाशकज्ञान, की पहचान नहीं |
छाया मिथ्या अज्ञान, निज का भान नहीं ||6||
हे करुणा...
ॐ ह्रीं श्री श्रीसम्भवनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
इस कर्म शत्रु को नाथ, निज गृह में पाला |
मेरे ही धन को लूट, निर्धन कर डाला ||7||
हे करुणा...
ॐ ह्रीं श्रीसम्भवनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
हो कर्म चक्र मम चूर्ण, भाव बना लाया |
शिवमय रस से पूर्ण, फल पाने आया ||8||
हे करुणा...
ॐ ह्रीं श्रीसम्भवनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
पर द्रव्यों की अभिलाष, अब तक भायी है |
आतम अनर्घ्य की बात नहीं सुहायी है ||9||
हे करुणा...
ॐ ह्रीं श्रीसम्भवनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये स्वाहा ।
पंचकल्याणक
(चौपाई)
फाल्गुन सुक्ल अष्टमी प्यारी, मात सुसेना है अवतारी |
ग्रैवेयक से आये स्वामी, माथ नवाऊं अन्तर्यामी ||1||
ॐ ह्रीं फाल्गुनशुक्लाष्टम्यां गर्भमंगलमंडिताय श्री श्रीसम्भवनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा आयी, श्रावस्ती नगरी हर्षायी |
पांडू शिला अभिषेक किया है, तिहूँ जग में आनन्द हुआ है ||2||
ॐ ह्रीं कार्तिकशुक्लपूर्णिमायां जन्ममंगलमंदिताय श्रीसम्भवनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मगसिर शुक्ल पूर्णिमा प्यारी, परिग्रह तजकर दीक्षा धारी |
देवों ने जयकार किया है, तव चरणों में नमन किया है ||3||
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षपूर्णिमायां तपोमंगलमंडिताय श्रीसम्भवनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी आई, केवलज्ञान लक्ष्मी पाई |
समवशरण की महिमा भारी, संभव जिन सबके हितकारी ||4||
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णचतुर्थ्यां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीसम्भवनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
धवलकूट विख्यात हुआ है, अष्ट करम का नाश किया है |
चैत्र शुक्ल षष्ठी सुखकारा, मन वच तन से नमन हमारा ||5||
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लषष्ठयां मोक्षमंगलमंडिताय श्री जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जाप्य
ॐ ह्रीं अर्हम श्रीसंभवनाथजिनेन्द्राय नमो नम: |
जयमाला
हे जिनेश्वर करूं मैं सदा प्रार्थना |
आप सुन लीजिये भक्त की भावना ||
नाथ संभव! अरूण आपकी अर्चना |
आत्मसिद्धि मिले एक ही कामना ||1||
सर्व ज्ञाता प्रभु हो विधाता प्रभो |
आज आया शरण पार कर दो विभो ||2||
नाथ संभव...
अश्व का चिन्ह पद पद्म में शोभता |
पुण्य तीर्थेश का अर्व मन मोहता ||3||
ननाथ संभव...
एक दिन मेघ का नाश होते दिखा |
सर्व वैभव तजा और संयम लखा ||4||
नाथ संभव...
वर्ष चौदह लिए मौन लि साधना |
पा लिया ज्ञान कैवल्य शुद्धात्मा ||5||
नाथ संभव...
श्री समोसरण रचना धनपति |
नर पशु देव देवी और आये यती ||6||
नाथ संभव...
नाथ की दिव्य अमृत ध्वनि जब खरे |
जैसे तरु से निरंतर ही सुमना झरें ||7||
नाथ संभव...
शक्ति से सिद्ध जाना है ये आत्मा |
जो चल रहे शिवपुर हो परमात्मा ||8||
नाथ संभव...
हे प्रभु भक्त पे अब कृपा कीजिये |
नाथ तेरा ही हूँ मैं बचा लीजिये ||9||
नाथ संभव...
एक ही भावना पूर्ण कर दीजिये |
नाथ संभव भवताप हर लीजिये ||10||
ॐ ह्रीं श्री जयमाला पूर्णार्घयं निर्वपामीति स्वाहा ||
(घत्ता)
श्री संभव जिनेश्वर, हे परमेश्वर, भव-भव का संताप हरो |
नित पूज रचाऊँ, ध्यान लगाऊं, विद्यासागर पूर्ण करो ||