श्रीमत वीर हरें भव-पीर, भरें सुख-सीर अनाकुलताई,
केहरि-अंक अरीकरदंक, नए हरि-पंकति-मौलि सुआई ||
मैं तुमको इत थापत हौं प्रभु, भक्ति समेत हिये हर्षाई,
हे करुणा-धन-धारक देव, यहाँ अब तिष्टहु शीघ्र ही आई ||
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म |
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम |
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम |
अष्टक
क्षीरोदधि सम शुचि नीर, कंचन-भृंग भरों,
प्रभु वेग हरो भव-पीर, यातैं धार करों |
श्रीवीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो,
जय वर्धमान गुण-धीर सन्मति-दायक हो ||
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
मलयागिर-चन्दन सार, केसर संग घसों |
प्रभु भव-आताप निवार, पूजत हिल हुलसों ||
श्रीवीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो,
जय वर्धमान गुण-धीर सन्मति-दायक हो ||
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
तंदुल-सित शशि सम शुद्ध लीनों थारी भरी |
तसु पुंज धरों अविरुद्ध, पावों शिव-नगरी ||
श्रीवीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो,
जय वर्धमान गुण-धीर सन्मति-दायक हो ||
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ।
सुरतरु के सुमन समेत, सुमन सुमन प्यारे |
सों मन्मथ-भंजन हेत, पूजों पद प्यारे ||
श्रीवीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो,
जय वर्धमान गुण-धीर सन्मति-दायक हो ||
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
रस-रज्जत सज्जत सद्य, मज्जत थार भरी |
पद जज्ज्त रज्जत अद्य, भज्ज्त भूख-अरी ||
श्रीवीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो,
जय वर्धमान गुण-धीर सन्मति-दायक हो ||
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
तम-खंडित मंडित-नेह, दीपक जोवत हों |
तुम पदतर हे सुख-गेह, भ्रम-तं खोवत हों ||
श्रीवीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो,
जय वर्धमान गुण-धीर सन्मति-दायक हो ||
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
हरिचन्दन अगर कपूर, चूर सुगंध करा |
तुम पदतर खेवट भूरि, आठों कर्म जरा ||
श्रीवीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो,
जय वर्धमान गुण-धीर सन्मति-दायक हो ||
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
ऋतु-फल कल-वर्जित लाय, कंचन-थार भरों |
शिव-फल-हित हे जिनराय, तुम ढिग भेंट धरों ||
श्रीवीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो,
जय वर्धमान गुण-धीर सन्मति-दायक हो ||
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
जल फल वसु सजि हिम-थार, तन-मन मोद धरों |
गुण गाऊं भव-दधि तार, पूजत पाप हरों ||
श्रीवीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो,
जय वर्धमान गुण-धीर सन्मति-दायक हो ||
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पंचकल्याणक
मोहि राखो हो सरना, श्रीवर्धमान जिनरायजी
मोहि राखो हो सरना
गरभ साढ़ सिट छटलियो थिति, त्रिशला उर अघ-हरना |
सुर सुरपति तित सेव करें नित, मैं पूजों भव-तरना ||
मोहि राखो हो सरना
ॐ ह्रीं आषाढ़शुक्लषष्ठयां गर्भकल्याणप्रप्ताय श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जनम चैत सित तेरस के दिन, कुंडलपुर कन-वरना |
सुरगिरी सुरगुरु पूज रचायो, मैं पूजों भव हरना ||
मोहि राखो हो सरना
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लत्रयोदश्यां जन्मकल्याणप्रप्ताय श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मगसिर असित मनोहर दशमी, ता दिन तप आरचना |
नृप-कुमार घर पारन कीनों, मैं पूजों तुम चरना ||
मोहि राखो हो सरना
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षकृष्णदशम्यां तप:कल्याणप्रप्ताय श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
शुकल दशैं वैशाख दिवस अरि, घाति चतुक छय करना |
केवल लहि भवि भव-सर तारे, जजों चरन सुख भरना ||
मोहि राखो हो सरना
ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लदशम्यां ज्ञानकल्याणप्राप्ताय श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
कार्तिक श्याम अमावस शिव-तिय, पावापुर तैं वरना |
गण-फनि-वृन्द जजैं तति बहुविधि, मैं पूजौं भय-हरना ||
मोहि राखो हो सरना
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णामावस्यायां मोक्षकल्याणप्राप्ताय जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(हरीगीता)
गनधर असनिधर, चक्रधर, हलधर गदाधर वरवदा
अरु चापधर विद्यासुधर, तिरसूलधर सेवहिं सदा |
दुखहरन आनन्द-भरन तारन, तरन चरन रसाल हैं
सुकुमाल गुन-मनिमाल उन्नत, भाल की जयमाल है ||
(घत्तानन्द)
जय त्रिशला नन्दन, हरिकृत वन्दन, जगदानन्दन चंदवरं |
भव-ताप-निकंदन, तन कन मन्दन, रहित-स्पंदन नयन-धरं ||
(तोटक)
जय केवल भानु कलासदनं, भवि-कोक-विकसनकंज-वनं |
जग-जेते-महारिपु-मोह-हरं, रज-ज्ञान-दृगांवर छु करं ||
गर्भादिक-मंगल-मंडित हो, दो-दारिद को नित खंडित हो |
जग मांहि तुम्हीं सत-पंडित हो, तुम ही भव-भाव विहंडित हो ||
हरिवंश सरोजं को रवि हो, बलवंत महंत तुम्हीं कवि हो |
लहि केवल धर्म-प्रकाश कियो, अबलों सोई मारग राजति हो ||
पुनि आप तने गुन मांहि सही, सुर मग्न रहैं जितने सब ही |
तिनकी वनिता गुन गावत हैं, ली माननि सों मन-भवत हैं ||
पुनि नाचत रंग उमंग भरी, तुअ भक्ति विशैं पग येम धरी |
झननं झननं झननं झननं, सुर लेत तहां तननं तननं ||
घननं घननं घन घंट बजै, दृमदं, दृमदं मिरदंग सजै |
गगनांगन-गर्भगता सुगता, ततता ततता अतता वितता ||
धृगतां धृगतां गति बाजत है, सुरताल रसाल जु छाजत है |
सननं सननं सननं नभ में, इक रूप अनेक जु धारि भ्रमें ||
कई नारि सुबीन बजावति हैं, तुमरो जस उज्ज्वल गावति हैं |
कर-ताल विषैं कर-ताल धरें, सुरताल विशाल जु नाद करें ||
इन आदि अनेक उछाह भरी, सुर भक्ति करें प्रभु जी तुमरी |
तुम ही जग-जीवनि की पिता हो, तुम ही बिन कारन तैं हितु हो ||
तुम ही सब विघ्न-विनाशन हो, तुम ही निज आनन्द-भासन हो |
तुम ही चित चिन्तित दायक हो, जगमांहि तुम्हीं सब लायक हो ||
तुमरे पन मंगल मांहि सही, जिय उत्तम पुन्न लियो सब ही |
हमको तुमरी सरनागत है, तुमरे गुण में मन पागत है ||
प्रभु मो हिय आप सदा बसिए, जब लों वसु कर्म नहीं नसिये |
तब लों तुम ध्यान हिय वरतो, तब लों श्रुत चिन्तन चित्त गहो ||
जब लों नहि नाश करों अरि को, शिव-नारि वरों समता धारि को |
यह द्योतब लों हमको जिन जी, हम जाचतु हैं इतनी सुन जी ||
(घत्तानन्द)
श्रीवीर-जिनेशा नमित-सुरेशा, नाग –नरेशा भगति भरा |
भक्त ध्यावै विघन नशावै, वांछित पावै शर्म-वरा ||
ॐ ह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय पूर्णार्घयं निर्वपामीति स्वाहा ||
(दोहा)
श्री सन्मति के जुग्न पद, जो पूजै धरि प्रीति |
भक्त सो चतुर नर, लहै मुक्ति नवनीत ||
इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलि क्षिपेत